Rahul Gandhi Vs Election Commission: 'वोट चोरी ने खत्म किया लोकतंत्र', चुनाव आयोग पर फिर बरसे राहुल गांधी
चुनाव आयोग, SIR और वोटर लिस्ट को लेकर चल रहे विवाद के बीच लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने 24 सितंबर को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए। करीब सवा घंटे की देरी से शुरू हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में राहुल गांधी ने दावा किया कि लोकसभा और विधानसभा चुनावों में वोटों से जुड़ी गड़बड़ियां हुईं और इसे उन्होंने लोकतंत्र तथा संविधान से जोड़कर पेश किया।राहुल गांधी ने कहा कि देश में आम तौर पर सरकारों के खिलाफ एंटी-इनकंबेंसी देखने को मिलती है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि 1971 में बांग्लादेश युद्ध में जीत के बावजूद इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली सरकार को बाद में राजनीतिक चुनौती का सामना करना पड़ा। राहुल ने सवाल उठाया कि नरेंद्र मोदी और बीजेपी के मामले में उन्हें ऐसी एंटी-इनकंबेंसी क्यों नहीं दिखी।
राहुल गांधी बोले- हमें सवाल का जवाब मिल गया
राहुल गांधी ने कहा कि उनकी पार्टी लंबे समय से यह समझने की कोशिश कर रही थी कि अलग-अलग सरकारों के खिलाफ एंटी-इनकंबेंसी कैसे काम करती है और कुछ चुनावों में इसके अलग परिणाम क्यों दिखाई देते हैं।उन्होंने अपने भाषण में वोट को लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियाद बताते हुए कहा कि मतदाताओं के वोट की सुरक्षा चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है। राहुल ने आरोप लगाया कि अगर वोट की प्रक्रिया प्रभावित होती है तो इसका असर संविधान और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर पड़ता है।राहुल गांधी ने इससे पहले भी चुनाव आयोग और बीजेपी पर वोटों में हेरफेर से जुड़े आरोप लगाए हैं। हालांकि, चुनाव आयोग इन आरोपों को खारिज करता रहा है।
14 लिखित आपत्तियों वाली रिपोर्ट से शुरू हुआ विवाद
राहुल गांधी की प्रेस कॉन्फ्रेंस से पहले द इंडियन एक्सप्रेस की 23 सितंबर की एक रिपोर्ट ने चुनाव आयोग के भीतर SIR और वोटर लिस्ट से जुड़े मुद्दों पर कथित मतभेदों को लेकर राजनीतिक विवाद बढ़ा दिया था।
रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले करीब 10 महीनों में कम से कम 14 बार कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं पर लिखित आपत्तियां दर्ज कीं। रिपोर्ट में कहा गया कि ये आपत्तियां नए मतदाताओं के रजिस्ट्रेशन, वोटर लिस्ट से नाम हटाने, Form-6 और चुनावी डेटाबेस जैसे मुद्दों से संबंधित थीं।
रिपोर्ट के अनुसार, दोनों चुनाव आयुक्तों की कुछ आपत्तियों की प्रतियां मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को भी भेजी गई थीं।
चुनाव आयोग ने कहा- अंतिम फैसले सर्वसम्मति से हुए
दूसरी तरफ, चुनाव आयोग ने इन रिपोर्टों के बाद अपना पक्ष रखा। आयोग ने कहा कि तीन सदस्यीय संवैधानिक संस्था में अलग-अलग राय, सुझाव और टिप्पणियां सामने आना सामान्य प्रक्रिया है।
आयोग के मुताबिक, SIR से जुड़े अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे। यानी चुनाव आयोग ने आंतरिक स्तर पर उठाई गई आपत्तियों और अंतिम निर्णय के बीच अंतर होने की बात कही है।
यही वजह है कि अब विवाद का एक प्रमुख सवाल यह है कि आयोग के भीतर दर्ज की गई आपत्तियों का अंतिम फैसलों पर क्या प्रभाव पड़ा और निर्णय लेने की प्रक्रिया वास्तव में किस तरह हुई।
SIR को लेकर पहले से चल रहा है विवाद
Special Intensive Revision यानी SIR के जरिए मतदाता सूचियों की समीक्षा की जा रही है। इस प्रक्रिया का उद्देश्य मतदाता सूची को अपडेट करना और मृत, स्थानांतरित या डुप्लीकेट जैसे रिकॉर्ड की पहचान करना है।
हालांकि, विपक्षी दलों ने SIR की प्रक्रिया, नाम हटाए जाने और दस्तावेजों से जुड़ी शर्तों को लेकर लगातार सवाल उठाए हैं। दूसरी ओर, चुनाव आयोग का कहना है कि मतदाता सूची को सही और अपडेट रखना चुनाव प्रक्रिया का जरूरी हिस्सा है।
द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, आयोग के भीतर उठाई गई आपत्तियों में नए वोटरों के Form-6, मतदाता डेटाबेस तक पहुंच और वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने-हटाने की प्रक्रिया जैसे मुद्दे शामिल थे।
राहुल गांधी पहले भी उठा चुके हैं 'वोट चोरी' का मुद्दा
राहुल गांधी पिछले साल से ही वोटर लिस्ट और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर कई बार प्रेस कॉन्फ्रेंस कर चुके हैं। उन्होंने चुनाव आयोग पर 'वोट चोरी' जैसे आरोप लगाए और बीजेपी के साथ मिलीभगत के आरोप भी लगाए हैं।
इन आरोपों पर चुनाव आयोग और बीजेपी की ओर से अलग-अलग मौकों पर जवाब दिए गए हैं और चुनाव आयोग ने चुनावी प्रक्रिया में गड़बड़ी के आरोपों को खारिज किया है।
अब आगे क्या?
राहुल गांधी की ताजा प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद SIR, चुनाव आयोग की आंतरिक प्रक्रिया और वोटर लिस्ट का मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में है।
एक तरफ विपक्ष आयोग की कार्यप्रणाली और कथित आपत्तियों की जांच की मांग उठा रहा है, जबकि चुनाव आयोग का कहना है कि अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए। ऐसे में आने वाले दिनों में इस विवाद से जुड़े दस्तावेज, आयोग का पक्ष और राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएं इस पूरे मामले को और स्पष्ट कर सकती हैं।

