Manipur Violence: तीन समुदायों के बीच क्यों गहराया विवाद? जमीन और ST दर्जे से जुड़े मुद्दे समझिए
मणिपुर में मई 2023 से शुरू हुआ जातीय संघर्ष राज्य के सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों से जुड़ा जटिल मुद्दा है। इस विवाद को समझने के लिए मैतेई, कुकी और नगा समुदायों की आबादी, भौगोलिक स्थिति, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, भूमि अधिकार और अनुसूचित जनजाति (ST) से जुड़े मुद्दों को समझना जरूरी है।
राज्य में मैतेई समुदाय मुख्य रूप से इंफाल घाटी में रहता है, जबकि कुकी और नगा सहित कई जनजातीय समुदाय पहाड़ी क्षेत्रों में बसे हैं। इसी भौगोलिक विभाजन के कारण जमीन और प्रशासनिक अधिकारों से जुड़े सवाल लंबे समय से मणिपुर की राजनीति में महत्वपूर्ण रहे हैं।
इंफाल घाटी और पहाड़ी क्षेत्रों का अलग सामाजिक ढांचा
मणिपुर की आबादी का बड़ा हिस्सा इंफाल घाटी में रहता है, जबकि राज्य का बड़ा भौगोलिक क्षेत्र पहाड़ियों में फैला हुआ है। मैतेई समुदाय घाटी क्षेत्र में प्रमुख आबादी रखता है, जबकि कुकी और नगा समुदाय मुख्य रूप से पहाड़ी जिलों में रहते हैं।
इस भौगोलिक अंतर का असर राजनीति और भूमि अधिकारों पर भी पड़ता है। राज्य विधानसभा की कुल 60 सीटों में बड़ी संख्या घाटी क्षेत्र से आती है, जबकि पहाड़ी क्षेत्रों के लिए अलग प्रशासनिक और संवैधानिक व्यवस्थाएं भी मौजूद हैं।
ST दर्जे का विवाद कैसे बना बड़ा मुद्दा?
मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति सूची में शामिल करने की मांग लंबे समय से उठती रही है। मार्च 2023 में मणिपुर हाईकोर्ट की एकल पीठ ने राज्य सरकार को इस मांग पर केंद्र के साथ प्रक्रिया आगे बढ़ाने के लिए कदम उठाने को कहा था। इसके बाद जनजातीय संगठनों की ओर से इसका विरोध हुआ और यह मुद्दा तेजी से राजनीतिक विवाद में बदल गया।
बाद में इस आदेश की न्यायिक समीक्षा हुई। अक्टूबर 2023 में हाईकोर्ट ने अपने पहले के निर्देश के उस हिस्से को हटा दिया, जिसमें मैतेई समुदाय को ST सूची में शामिल करने के मामले पर राज्य सरकार को विचार करने के लिए कहा गया था।
मैतेई समुदाय की ओर से ST दर्जे की मांग के पीछे भूमि, संवैधानिक संरक्षण और जनजातीय पहचान से जुड़े तर्क दिए जाते रहे हैं। दूसरी ओर, कुकी और नगा सहित जनजातीय संगठनों ने आशंका जताई कि इससे उनके मौजूदा संवैधानिक और भूमि अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।
जमीन का सवाल भी विवाद के केंद्र में
मणिपुर में घाटी और पहाड़ी क्षेत्रों के भूमि अधिकारों से जुड़े अलग-अलग नियम हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में भूमि और प्रशासन से जुड़े विशेष प्रावधानों के कारण घाटी और पहाड़ के बीच जमीन की खरीद-बिक्री तथा बसने के अधिकार लंबे समय से संवेदनशील विषय रहे हैं।
मैतेई संगठनों की ओर से पहाड़ी क्षेत्रों में भूमि संबंधी प्रतिबंधों को लेकर सवाल उठाए जाते रहे हैं, जबकि जनजातीय संगठनों का पक्ष रहा है कि पहाड़ी क्षेत्रों की जमीन और वहां के समुदायों के संवैधानिक संरक्षण को बनाए रखना जरूरी है।
कुकी और नगा संबंधों का भी है ऐतिहासिक संदर्भ
मणिपुर के मौजूदा संघर्ष को केवल मैतेई और कुकी समुदायों के बीच विवाद के रूप में देखना पूरे सामाजिक समीकरण को नहीं दर्शाता। कुकी और नगा समुदायों के बीच भी अतीत में हिंसक संघर्ष हुए हैं और दोनों की अपनी अलग राजनीतिक एवं सामाजिक मांगें रही हैं।
हालांकि, मौजूदा संकट में विभिन्न समुदायों के बीच संबंधों को अलग-अलग स्थानीय परिस्थितियों और राजनीतिक मुद्दों के संदर्भ में समझना जरूरी है। राज्य के कई हिस्सों में समुदायों के बीच अविश्वास और विस्थापन ने स्थिति को और जटिल बनाया है।
विवाद को समझने में कई मुद्दे अहम
मणिपुर संकट के पीछे केवल एक कारण नहीं है। भूमि अधिकार, ST दर्जे की मांग, पहाड़ी और घाटी क्षेत्रों का प्रशासनिक विभाजन, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, ऐतिहासिक सामुदायिक संबंध और सुरक्षा से जुड़े मुद्दे एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
इसी वजह से मणिपुर में शांति और सामान्य स्थिति बहाल करने की प्रक्रिया केवल कानून-व्यवस्था के स्तर तक सीमित नहीं रहती, बल्कि इसमें अलग-अलग समुदायों के अधिकारों, सुरक्षा और राजनीतिक मांगों पर संवाद भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

