यूपी में गरमाई सियासत: क्या हिंदुत्व के पिच पर खेला जाएगा अगला चुनाव? जानिए योगी का सियासी मास्टरप्लान
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी सरगर्मियां तेज होती दिखाई दे रही हैं। एक तरफ भारतीय जनता पार्टी (BJP) हिंदुत्व के मुद्दे को मजबूत करने में जुटी है, तो दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी (SP) के अध्यक्ष अखिलेश यादव पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक यानी PDA फॉर्मूले के जरिए चुनावी माहौल बनाने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आगामी चुनाव में जाति की राजनीति हावी होगी, धर्म का मुद्दा प्रभावी रहेगा या विकास चुनाव की दिशा तय करेगा?पिछले कुछ महीनों से उत्तर प्रदेश की राजनीति में PDA की चर्चा प्रमुखता से हो रही थी। लेकिन हाल के दिनों में काशी, अयोध्या, मथुरा और संभल जैसे मुद्दे फिर चर्चा में आ गए हैं। राजनीतिक जानकारियों और बयानों के बीच ऐसा माना जा रहा है कि BJP हिंदुत्व के मुद्दे को दोबारा केंद्र में लाने की कोशिश कर रही है।
80-20 के बयान से लेकर अयोध्या की चुनौती तक, क्यों बढ़ी सियासी हलचल?
उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के 80-20 वाले बयान और अखिलेश यादव की अयोध्या यात्रा को लेकर खूब चर्चा हो रही है। अखिलेश यादव ने अयोध्या में एक धार्मिक कार्यक्रम में हिस्सा लिया, लेकिन राम मंदिर दर्शन के लिए नहीं गए। इसी दौरान उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को अयोध्या से चुनाव लड़ने की चुनौती दी।
इसके जवाब में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बलरामपुर में अखिलेश यादव की चुनौती स्वीकार करने की बात कही और उन्हें अपने सामने चुनाव लड़ने का न्योता दिया। इसके बाद दोनों नेताओं के बीच राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई।
उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने भी अखिलेश यादव के मथुरा नहीं जाने को लेकर सवाल उठाए। वहीं, AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने अखिलेश यादव को संभल से चुनाव लड़ने की चुनौती दी। इन बयानों के बाद प्रदेश की राजनीति में धर्मस्थलों और चुनावी रणनीति को लेकर बहस तेज हो गई।
क्या विधानसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे अखिलेश यादव?
अखिलेश यादव से जब चुनाव लड़ने को लेकर सवाल पूछा गया, तो उन्होंने बिना किसी का नाम लिए कहा कि जो लोग टिकट तय नहीं करते, वे यह कैसे तय कर सकते हैं कि कौन कहां से चुनाव लड़ेगा। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें अच्छा लग रहा है कि उनके सामने चुनाव लड़ने के लिए इतने सारे विकल्प आ गए हैं।
लखनऊ में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान अखिलेश यादव ने यह भी कहा था कि अगर बिना चुनाव लड़े मुख्यमंत्री की कुर्सी मिल जाए, तो इससे अच्छी बात क्या होगी। उनके इस बयान को विधानसभा चुनाव नहीं लड़ने के संकेत के तौर पर भी देखा गया। हालांकि, उनके चुनाव लड़ने को लेकर अंतिम फैसला क्या होगा, यह स्पष्ट नहीं है।
जाति, धर्म या विकास—किस मुद्दे पर होगा चुनाव?
उत्तर प्रदेश की राजनीति में जातीय समीकरण और धार्मिक मुद्दे लंबे समय से अहम भूमिका निभाते रहे हैं। BJP के पास मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का हिंदुत्ववादी चेहरा है, जबकि अखिलेश यादव PDA के जरिए पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक वर्गों को एकजुट करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं।
इसी बीच काशी, अयोध्या, मथुरा और संभल जैसे मुद्दों का फिर से चर्चा में आना राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। BJP की रणनीति को हिंदुत्व के मुद्दे को मजबूत करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है, जबकि समाजवादी पार्टी सामाजिक न्याय और जातीय प्रतिनिधित्व पर जोर देती रही है।
हालांकि, चुनावी नतीजे केवल जाति और धर्म से तय नहीं होते। बेरोजगारी, महंगाई, कानून-व्यवस्था, किसानों की समस्याएं और विकास जैसे मुद्दे भी मतदाताओं के फैसले को प्रभावित कर सकते हैं।
राज्यसभा चुनाव में BJP ने साधे जातीय समीकरण
राज्यसभा चुनाव के दौरान BJP ने अलग-अलग जातीय समूहों को प्रतिनिधित्व देने की रणनीति अपनाई। रिपोर्ट के मुताबिक, पार्टी ने तीन पिछड़े वर्गों, दो दलितों, दो ब्राह्मणों और एक राजपूत उम्मीदवार को मौका देकर विभिन्न सामाजिक वर्गों को साधने की कोशिश की।
पिछड़े वर्गों में पाल, कुर्मी और लोध समुदायों को प्रतिनिधित्व दिया गया। वहीं, सोनकर और रावत समुदायों से उम्मीदवारों को अवसर देकर गैर-जाटव दलित वर्गों तक पहुंच बनाने का प्रयास किया गया। ब्राह्मण और राजपूत उम्मीदवारों को शामिल करके सवर्ण मतदाताओं के बीच भी संतुलन बनाने की कोशिश दिखाई दी।
इससे स्पष्ट होता है कि BJP की राजनीति में हिंदुत्व के साथ-साथ जातीय समीकरण भी महत्वपूर्ण हैं। वहीं, अखिलेश यादव PDA के जरिए सामाजिक प्रतिनिधित्व को अपनी राजनीति का प्रमुख आधार बनाए हुए हैं।
अयोध्या में भगवा अंगवस्त्र और टीका लगाकर दिखे अखिलेश यादव
अयोध्या दौरे के दौरान अखिलेश यादव भगवा अंगवस्त्र और माथे पर टीका लगाए नजर आए। इसे उनकी सॉफ्ट हिंदुत्व की रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। समाजवादी पार्टी प्रमुख इटावा में केदारेश्वर मंदिर का निर्माण भी करवा रहे हैं और अयोध्या में राम मंदिर दर्शन को लेकर पूछे गए सवाल पर उन्होंने केदारेश्वर मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा तक इंतजार करने की बात कही।
इसके अलावा, राम मंदिर में चढ़ावे से जुड़ी कथित अनियमितताओं का मुद्दा उठाकर भी अखिलेश यादव धार्मिक और जनहित से जुड़े सवालों को राजनीतिक बहस का हिस्सा बना रहे हैं।
दूसरी ओर, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और BJP के नेता काशी, अयोध्या तथा मथुरा जैसे धार्मिक केंद्रों का जिक्र करते नजर आ रहे हैं। ऐसे में दोनों प्रमुख राजनीतिक खेमे अपने-अपने तरीके से मतदाताओं तक पहुंच बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
चुनाव तक किसका नैरेटिव रहेगा हावी?
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले BJP और समाजवादी पार्टी के बीच राजनीतिक मुकाबला केवल उम्मीदवारों और सीटों तक सीमित नहीं दिखाई दे रहा, बल्कि यह चुनावी नैरेटिव की लड़ाई भी बनता जा रहा है। BJP हिंदुत्व और धार्मिक पहचान से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता दे रही है, जबकि अखिलेश यादव PDA और सामाजिक न्याय के जरिए अपना आधार मजबूत करना चाहते हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि चुनाव नजदीक आने तक जातीय समीकरण, धार्मिक मुद्दे और विकास में से कौन-सा मुद्दा सबसे ज्यादा प्रभाव डालेगा। क्या BJP हिंदुत्व के सहारे चुनावी माहौल अपने पक्ष में कर पाएगी, या अखिलेश यादव का PDA फॉर्मूला 2024 जैसा राजनीतिक प्रभाव दोहरा पाएगा?

