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Google AI Hub: विशाखापत्तनम में ₹1.3 लाख करोड़ का डेटा सेंटर, जमीन अधिग्रहण और पर्यावरण पर उठे सवाल

Google AI Hub: विशाखापत्तनम में ₹1.3 लाख करोड़ का डेटा सेंटर, जमीन अधिग्रहण और पर्यावरण पर उठे सवाल

आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम में गूगल का बड़ा AI और डेटा सेंटर हब विकसित किया जा रहा है। करीब 15 अरब डॉलर यानी लगभग 1.3 लाख करोड़ रुपये की इस परियोजना के तहत तीन कैंपस बनाए जाने की योजना है। राज्य सरकार ने इसके लिए तीन गांवों में करीब 586 एकड़ जमीन उपलब्ध कराई है। हालांकि, परियोजना को लेकर स्थानीय लोगों की आजीविका, जंगलों की कटाई, पानी की उपलब्धता और पर्यावरणीय मंजूरियों पर सवाल उठ रहे हैं।

तीन कैंपस में विकसित होगा डेटा सेंटर

परियोजना के तहत अदाविवरम-मुदासरलोवा क्षेत्र में निर्माण कार्य शुरू होने की जानकारी सामने आई है। इस हब में बड़े डेटा सेंटर और अंतरराष्ट्रीय समुद्र के नीचे बिछाई जाने वाली इंटरनेट केबलों का नेटवर्क शामिल होगा। कंपनी की योजना के अनुसार, परियोजना का संचालन 2028 में शुरू हो सकता है।

यह परियोजना आंध्र प्रदेश को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर के प्रमुख केंद्रों में शामिल करने की दिशा में अहम मानी जा रही है।

जमीन जाने से ग्रामीणों की आजीविका पर असर

स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि खेती और जमीन उनकी आजीविका का प्रमुख आधार रही है। तरलुवाड़ा की पूर्व सरपंच पायला कोंडम्मा के मुताबिक, सर्वे के दौरान अधिकारियों ने जमीन को लेकर भरोसा दिलाया था। वहीं, किसान अप्पलाराजू ने आरोप लगाया कि वर्षों पहले आवंटित जमीन अब परियोजना के लिए ली जा रही है।

कुछ स्थानीय लोगों और पर्यावरण से जुड़े समूहों ने आरोप लगाया है कि करीब 160 एकड़ क्षेत्र में जंगल काटने और पहाड़ी को समतल करने के लिए खुदाई की जा रही है। वन्यजीव अभयारण्य और जलाशय के नजदीक परियोजना होने के कारण इसके पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर भी चिंता जताई जा रही है।

पानी बचाने के लिए एयर-कूलिंग तकनीक का दावा

बड़े डेटा सेंटर में सर्वर को ठंडा रखने के लिए ऊर्जा और पानी की जरूरत एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। स्थानीय स्तर पर यह चिंता जताई गई है कि परियोजना का आसपास के जलस्रोतों पर क्या असर पड़ेगा।

गूगल की ओर से कहा गया है कि पानी की उपलब्धता और स्थानीय परिस्थितियों का आकलन करने के बाद एयर-कूलिंग तकनीक अपनाने का फैसला किया गया है। इस तकनीक में पारंपरिक लिक्विड-कूलिंग प्रणालियों की तुलना में पानी की जरूरत कम हो सकती है। हालांकि, इससे पूरे परिसर में पानी की खपत पूरी तरह खत्म हो जाएगी, ऐसा नहीं माना जा सकता।

पर्यावरणीय मंजूरी को लेकर भी सवाल

परियोजना से जुड़ी पर्यावरणीय मंजूरियों को आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट में चुनौती दिए जाने की जानकारी सामने आई है। राज्य सरकार के हलफनामे में मंजूरी के लिए निर्माण क्षेत्र को आधार बनाए जाने का उल्लेख बताया गया है। इस बीच, परियोजना के संचालन के दौरान पर्यावरण पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं।

इस मामले में मंजूरी की शर्तों, जल संसाधनों के इस्तेमाल और पर्यावरणीय प्रभावों का आकलन महत्वपूर्ण होगा। इन पहलुओं पर अंतिम स्थिति संबंधित दस्तावेजों और न्यायिक प्रक्रिया से स्पष्ट होगी।

दूसरे देशों में डेटा सेंटर से पानी और बिजली की चुनौती

डेटा सेंटर के तेजी से विस्तार के साथ कई देशों में पानी और बिजली की खपत पर बहस बढ़ी है।

इंडोनेशिया: बाटाम द्वीप में डेटा सेंटरों के विस्तार के बीच स्थानीय लोगों ने जल आपूर्ति को लेकर शिकायतें की हैं। कुछ निवासियों का कहना है कि उन्हें पानी के लिए टैंकरों पर निर्भर रहना पड़ रहा है। हालांकि, जल संकट और डेटा सेंटरों के बीच सीधे संबंध को स्थापित करने के लिए स्थानीय स्तर के आंकड़ों की जरूरत होगी।

चीन: चीन के उलानकाब क्षेत्र में डेटा सेंटरों के विकास के दौरान नवीकरणीय ऊर्जा के इस्तेमाल पर जोर दिया जा रहा है। ठंडी जलवायु भी सर्वर को ठंडा रखने की जरूरत कम करने में मदद कर सकती है। ऐसी व्यवस्थाएं ऊर्जा की मांग और पर्यावरणीय प्रभाव घटाने के संभावित उपायों में शामिल हैं।

रोजगार और स्थानीय विकास पर भी रहेगी नजर

गूगल की परियोजना से निवेश, डिजिटल सेवाओं और स्थानीय आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। लेकिन स्थानीय समुदाय के लिए इसका वास्तविक लाभ इस बात पर निर्भर करेगा कि कितने रोजगार पैदा होते हैं, उनमें स्थानीय लोगों की भागीदारी कितनी रहती है और जमीन से प्रभावित परिवारों को किस तरह का मुआवजा या पुनर्वास मिलता है।

विशाखापत्तनम का यह डेटा सेंटर हब भारत के AI इन्फ्रास्ट्रक्चर को मजबूत कर सकता है। साथ ही, परियोजना की सफलता का आकलन केवल निवेश और तकनीकी विकास से नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण, जल प्रबंधन और स्थानीय लोगों के हितों को सुरक्षित रखने के आधार पर भी किया जाएगा।

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