जम्मू-कश्मीर में उमर अब्दुल्ला सरकार पर संकट के बादल! 25 नाराज विधायकों ने फारूक अब्दुल्ला से की मुलाकात, जानिए क्या हैं बगावत की 3 बड़ी वजहें
जम्मू-कश्मीर की राजनीति में इन दिनों हलचल तेज हो गई है। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की सरकार को लेकर सियासी संकट की अटकलों के बीच नेशनल कॉन्फ्रेंस (NC) के नाराज विधायकों ने शुक्रवार को श्रीनगर में पार्टी अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला के आवास पर अहम बैठक की। इस बैठक में मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला भी मौजूद रहे। नाराज विधायकों ने पार्टी नेतृत्व के सामने अपनी समस्याएं और मांगें रखीं। हालांकि, बैठक के बाद पार्टी नेतृत्व ने भरोसा दिलाया कि सभी शिकायतों पर गंभीरता से विचार किया जाएगा।
बैठक के बाद नाराज विधायकों के नेता नजीर अहमद गुरेजी ने कहा कि उन्होंने अपनी शिकायतें पार्टी नेतृत्व के सामने रख दी हैं। उन्हें आश्वासन मिला है कि इन मुद्दों पर ध्यान दिया जाएगा। वहीं, फारूक अब्दुल्ला ने पार्टी में किसी तरह की टूट की संभावना को खारिज करते हुए कहा कि नेशनल कॉन्फ्रेंस कभी नहीं टूटेगी। उन्होंने विधायकों की शिकायतें सुनने और उनका समाधान करने का भरोसा दिया।फारूक अब्दुल्ला के मुताबिक, कुछ समस्याओं का समाधान तुरंत किया जा सकता है, जबकि कुछ मामलों में समय लगेगा। इस बयान के बाद फिलहाल पार्टी में जारी नाराजगी को शांत करने की कोशिशें तेज हो गई हैं।
25 नाराज विधायकों की क्या हैं प्रमुख मांगें?
नेशनल कॉन्फ्रेंस के करीब 25 विधायकों की नाराजगी के पीछे कई राजनीतिक और प्रशासनिक कारण बताए जा रहे हैं। इन विधायकों ने सरकार और पार्टी नेतृत्व के सामने कुछ प्रमुख मांगें रखी हैं।
इनमें मुख्यमंत्री के सलाहकार नासिर सोगमी को उनके पद से हटाने की मांग शामिल है। इसके अलावा डिप्टी सीएम सुरिंदर चौधरी से सड़क निर्माण विभाग वापस लेने या उन्हें पद से हटाने की मांग भी उठाई गई है। नाराज विधायक सरकार से जुड़े लोगों पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच कराने की मांग भी कर रहे हैं।
बताया जा रहा है कि नाराज विधायकों ने 30 अक्टूबर से 5 नवंबर के बीच पांच गुप्त बैठकें की थीं। इन बैठकों में उन्होंने अपनी मांगों पर चर्चा करने के साथ पार्टी नेतृत्व से बातचीत की रणनीति भी तैयार की।
श्रीनगर के सांसद आगा रूहुल्लाह मेहंदी ने भी छोड़ी पार्टी
नेशनल कॉन्फ्रेंस के लिए मुश्किलें उस समय और बढ़ गईं, जब श्रीनगर से सांसद आगा रूहुल्लाह मेहंदी ने मंगलवार को पार्टी से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने अपने फैसले को आजादी का निर्णय बताते हुए कहा कि वह अब नेशनल कॉन्फ्रेंस का हिस्सा नहीं हैं।
आगा रूहुल्लाह मेहंदी ने अपने बयान में कहा कि वह अपनी आजादी के दस्तावेज पर हस्ताक्षर कर रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि मंगलवार दोपहर 2:40 बजे से उनका पार्टी से संबंध समाप्त हो गया है।
इसके बाद गुरुवार को लोकसभा स्पीकर ने उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया। इस फैसले के बाद आगा रूहुल्लाह मेहंदी अब लोकसभा सांसद नहीं रहे। पार्टी के भीतर पहले से चल रही नाराजगी के बीच उनके इस्तीफे को नेशनल कॉन्फ्रेंस के लिए एक बड़ा राजनीतिक झटका माना जा रहा है।
कैबिनेट विस्तार के बाद क्यों बढ़ी विधायकों की नाराजगी?
नेशनल कॉन्फ्रेंस के भीतर असंतोष की एक बड़ी वजह 27 अक्टूबर को हुआ कैबिनेट विस्तार भी बताया जा रहा है। इस दौरान जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने नए मंत्रियों को पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई थी।
कैबिनेट विस्तार में नेशनल कॉन्फ्रेंस के चार विधायकों अली मोहम्मद सागर, मीर सैफुल्लाह, शमीमा फिरदौस और अल्ताफ अहमद कल्लू को मंत्री बनाया गया। वहीं, निर्दलीय विधायक सतीश शर्मा को मंत्रिमंडल से बाहर कर दिया गया।
इस विस्तार में कई वरिष्ठ विधायकों को मंत्री पद नहीं मिला, जबकि उनके नामों की चर्चा पहले से चल रही थी। इनमें नजीर अहमद गुरेजी और मुबारक गुल जैसे नेता भी शामिल थे। बाद में मुबारक गुल को फारूक अब्दुल्ला ने अली मोहम्मद सागर की जगह पार्टी का महासचिव नियुक्त किया।
माना जा रहा है कि मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिलने और सरकार में कुछ पदों को लेकर असंतोष ने पार्टी के अंदर नाराजगी को और बढ़ाया है।
क्या 25 विधायकों की बगावत से गिर सकती है उमर अब्दुल्ला सरकार?
जम्मू-कश्मीर में जारी राजनीतिक घटनाक्रम के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या नाराज विधायकों की बगावत से उमर अब्दुल्ला सरकार गिर सकती है? इसे समझने के लिए विधानसभा का सीटों का गणित जानना जरूरी है।
जम्मू-कश्मीर विधानसभा में कुल 95 सीटें हैं। इनमें 90 निर्वाचित और 5 मनोनीत सीटें शामिल हैं। फिलहाल मनोनीत की जाने वाली सभी पांच सीटें खाली बताई गई हैं। ऐसे में मौजूदा स्थिति में बहुमत के लिए 46 विधायकों का समर्थन जरूरी है।
मौजूदा आंकड़ों के मुताबिक, नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेतृत्व वाले गठबंधन के पास 53 सीटें हैं। यदि 25 विधायक इस्तीफा दे देते हैं, तो गठबंधन की प्रभावी संख्या घटकर 28 रह सकती है। ऐसी स्थिति में सदन की प्रभावी सदस्य संख्या भी कम होगी और बहुमत का आंकड़ा 33 तक पहुंच सकता है।
इस गणित के अनुसार, 28 विधायकों के साथ गठबंधन बहुमत से पीछे रह जाएगा और सरकार अल्पमत में आ सकती है। हालांकि, यह स्थिति तभी बनेगी जब विधायक वास्तव में इस्तीफा दें और उनके इस्तीफे स्वीकार हो जाएं। फिलहाल नाराज विधायकों की ओर से ऐसी कोई अंतिम कार्रवाई सामने नहीं आई है। इसलिए सरकार गिरने की अटकलों को अभी राजनीतिक संभावना के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।
पिछले पांच साल में तीन बड़ी क्षेत्रीय पार्टियों में हुई टूट
देश की राजनीति में पिछले कुछ वर्षों के दौरान कई बड़ी क्षेत्रीय पार्टियों को अंदरूनी बगावत का सामना करना पड़ा है। महाराष्ट्र में शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) में हुई टूट इसके बड़े उदाहरण हैं। इनके अलावा टीएमसी से जुड़ी टूट का दावा भी इस रिपोर्ट में किया गया है, हालांकि इस तरह के राजनीतिक घटनाक्रम की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है।
1. शिवसेना में बगावत
जून 2022 में एकनाथ शिंदे ने उद्धव ठाकरे के नेतृत्व के खिलाफ बगावत कर दी थी। उनके साथ शिवसेना के बड़ी संख्या में विधायक आ गए। इसके बाद महाराष्ट्र में महाविकास अघाड़ी सरकार गिर गई और एकनाथ शिंदे ने बीजेपी के समर्थन से नई सरकार बनाई।
बाद में चुनाव आयोग ने एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले गुट को असली शिवसेना माना और पार्टी का नाम तथा 'तीर-कमान' चुनाव चिह्न आवंटित किया। इस घटनाक्रम ने महाराष्ट्र की राजनीति को पूरी तरह बदल दिया।
2. राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) में विभाजन
जुलाई 2023 में अजित पवार ने अपने चाचा शरद पवार के खिलाफ बगावत कर दी। वह अपने समर्थक विधायकों के साथ महाराष्ट्र की तत्कालीन बीजेपी-शिवसेना सरकार में शामिल हो गए और उपमुख्यमंत्री बने।
इसके बाद एनसीपी दो गुटों में बंट गई। पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर भी विवाद हुआ। चुनाव आयोग ने बाद में अजित पवार के गुट को एनसीपी का नाम और घड़ी चुनाव चिह्न दिया।
3. टीएमसी में टूट का दावा
रिपोर्ट में 2026 के दौरान तृणमूल कांग्रेस (TMC) में रितब्रत बनर्जी के नेतृत्व में बड़े बागी गुट के अलग होने और चुनाव आयोग की ओर से पार्टी के नाम तथा चुनाव चिह्न को लेकर कार्रवाई किए जाने का दावा किया गया है। इस घटनाक्रम की पुष्टि के लिए आधिकारिक जानकारी जरूरी है।
फिलहाल पार्टी नेतृत्व के सामने सबसे बड़ी चुनौती
जम्मू-कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस के सामने इस समय दोहरी चुनौती है। एक तरफ पार्टी को नाराज विधायकों की शिकायतों का समाधान करना है, वहीं दूसरी तरफ सरकार की स्थिरता बनाए रखना भी जरूरी है।
फारूक अब्दुल्ला ने पार्टी में टूट की संभावना को खारिज करते हुए विधायकों को भरोसा दिलाया है कि उनकी मांगों पर काम किया जाएगा। अब देखना होगा कि पार्टी नेतृत्व अपने नाराज नेताओं को कितना संतुष्ट कर पाता है और क्या सरकार के भीतर चल रही खींचतान खत्म होती है।
फिलहाल उमर अब्दुल्ला सरकार पर संकट की अटकलें जरूर तेज हैं, लेकिन सरकार का भविष्य नाराज विधायकों के अगले कदम और पार्टी नेतृत्व के फैसलों पर निर्भर करेगा।

