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Bihar Delimitation: 2029 में बिहार की लोकसभा सीटें 40 से बढ़कर 60 होंगी? इन 10 सीटों के बंटवारे की चर्चा

Bihar Delimitation: 2029 में बिहार की लोकसभा सीटें 40 से बढ़कर 60 होंगी? इन 10 सीटों के बंटवारे की चर्चा

बिहार में आगामी लोकसभा चुनाव से पहले परिसीमन को लेकर एक नई चर्चा सामने आई है। एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) से जुड़े एक मसौदे में राज्य की लोकसभा सीटों की संख्या 40 से बढ़ाकर 60 करने का प्रस्ताव सुझाया गया है। इसके तहत 10 मौजूदा संसदीय क्षेत्रों को तीन हिस्सों में बांटने और बाकी 30 सीटों को यथावत रखने का फॉर्मूला बताया गया है।

हालांकि, इसे अंतिम सरकारी फैसला या स्वीकृत परिसीमन योजना नहीं माना जा सकता। नई सीटों की संख्या, निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं और प्रस्ताव को लागू करने की प्रक्रिया पर आधिकारिक स्थिति स्पष्ट होना जरूरी है।

क्या है सीटें बढ़ाने का प्रस्ताव?

रिपोर्ट के मुताबिक, आर्थिक सलाहकार परिषद से जुड़े एक कार्यपत्र में लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों के पुनर्गठन के लिए गणितीय फॉर्मूले पर चर्चा की गई है। इसमें सीटों की संख्या बढ़ाने और कुछ निर्वाचन क्षेत्रों को दो या तीन हिस्सों में विभाजित करने का सुझाव बताया गया है।

इससे अलग, लोकसभा में महिला आरक्षण लागू करने और परिसीमन की प्रक्रिया को लेकर संवैधानिक व कानूनी बदलावों की चर्चा भी की गई है। लेकिन किसी प्रस्ताव, मसौदे और संसद से पारित कानून के बीच अंतर है। अंतिम व्यवस्था के लिए संबंधित संवैधानिक प्रक्रिया और आधिकारिक अधिसूचनाएं महत्वपूर्ण होंगी।

बिहार की किन 10 सीटों के बंटवारे की चर्चा?

रिपोर्ट में जिन संसदीय क्षेत्रों के नाम बताए गए हैं, वे हैं:

  • पटना साहिब
  • पाटलिपुत्र
  • दरभंगा
  • सारण
  • बेगूसराय
  • आरा
  • मधुबनी
  • झंझारपुर
  • खगड़िया
  • मुंगेर

दावे के अनुसार, इन क्षेत्रों को तीन हिस्सों में बांटने से बिहार में लोकसभा सीटों की संख्या 40 से बढ़कर 60 हो सकती है। हालांकि, किस विधानसभा क्षेत्र या इलाके को किस नई संसदीय सीट में शामिल किया जाएगा, इसका कोई अंतिम नक्शा इस जानकारी में नहीं दिया गया है।

परिसीमन के लिए किन आधारों पर हो सकता है विचार?

रिपोर्ट में निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्गठन के लिए सात प्रमुख आधारों का उल्लेख किया गया है:

  1. मतदाताओं की संख्या
  2. संसदीय क्षेत्र का भौगोलिक आकार
  3. शहरी आबादी का घनत्व
  4. अनुसूचित जाति की जनसंख्या
  5. अनुसूचित जनजाति की जनसंख्या
  6. भाषाई विविधता
  7. मतदान केंद्रों की संख्या

इन आधारों पर विचार करने का उद्देश्य निर्वाचन क्षेत्रों का बेहतर प्रबंधन और मतदाताओं की पहुंच आसान बनाना हो सकता है। हालांकि, किसी भी वास्तविक परिसीमन में लागू कानून, आधिकारिक आंकड़े और निर्धारित प्रक्रिया ही निर्णायक होंगे।

क्या भाजपा और NDA को मिल सकता है फायदा?

रिपोर्ट में दावा किया गया है कि बिहार की कुछ सीटों के बंटवारे से भाजपा और उसके सहयोगी दलों को राजनीतिक लाभ मिल सकता है। इसके पीछे अलग-अलग क्षेत्रों के जातीय समीकरण, शहरी और ग्रामीण मतदाताओं का अनुपात तथा पिछले चुनावों के नतीजों को आधार बनाया गया है।

हालांकि, यह तय करना अभी संभव नहीं है कि परिसीमन से किस दल को फायदा होगा। इसका आकलन नई सीटों की सीमाएं तय होने, उम्मीदवारों के चयन, गठबंधनों और मतदाताओं के व्यवहार पर निर्भर करेगा। केवल किसी सीट को विभाजित करने से किसी राजनीतिक दल की जीत या हार सुनिश्चित नहीं होती।

पटना साहिब: शहरी और ग्रामीण इलाकों का समीकरण

पटना साहिब में शहरी आबादी का बड़ा हिस्सा है, जबकि इसके संसदीय क्षेत्र में ग्रामीण इलाके भी शामिल हैं। रिपोर्ट में अनुमान जताया गया है कि इसके विभाजन से अलग-अलग क्षेत्रों के राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं।

लेकिन यह कहना जल्दबाजी होगी कि किसी खास विधानसभा क्षेत्र को अलग करने से भाजपा या विपक्षी दलों की स्थिति निश्चित रूप से मजबूत होगी। इसके लिए प्रस्तावित सीमाओं और आधिकारिक चुनावी आंकड़ों का अध्ययन जरूरी होगा।

पाटलिपुत्र: यादव और अन्य समुदायों की भूमिका

पाटलिपुत्र में राष्ट्रीय जनता दल और भाजपा के बीच मुकाबला महत्वपूर्ण रहा है। रिपोर्ट में यादव, भूमिहार, कुर्मी, कुशवाहा और मुस्लिम मतदाताओं के समीकरणों का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि सीटों के पुनर्गठन से चुनावी मुकाबले की प्रकृति बदल सकती है।

हालांकि, यह अभी स्पष्ट नहीं है कि प्रस्तावित विभाजन में कौन से इलाके अलग होंगे। इसलिए यह दावा करना कि इससे किसी दल का आधार समाप्त हो जाएगा, फिलहाल केवल राजनीतिक अनुमान होगा।

बेगूसराय और मुंगेर: स्थानीय समीकरणों पर नजर

बेगूसराय की राजनीति में भूमिहार, मुस्लिम और अन्य पिछड़े समुदायों की भूमिका पर चर्चा होती रही है। वहीं मुंगेर में भूमिहार, यादव, कुर्मी और अति पिछड़े समुदायों के समीकरण चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं।

रिपोर्ट में आशंका जताई गई है कि इन क्षेत्रों की सीमाएं बदलने से विभिन्न दलों के पारंपरिक वोट आधार पर असर पड़ सकता है। लेकिन नए निर्वाचन क्षेत्रों का स्वरूप सामने आने से पहले किसी निश्चित राजनीतिक लाभ का अनुमान लगाना उचित नहीं होगा।

दरभंगा और मधुबनी: सामाजिक समीकरण कितने अहम?

दरभंगा और मधुबनी में मैथिल ब्राह्मण, यादव, मुस्लिम तथा अन्य पिछड़े समुदायों की चुनावी भूमिका का उल्लेख रिपोर्ट में किया गया है। दोनों क्षेत्रों में विधानसभा सीटों के संयोजन और स्थानीय मुद्दों का चुनावी नतीजों पर असर पड़ सकता है।

रिपोर्ट में यह संभावना जताई गई है कि परिसीमन से अलग-अलग समुदायों के मतदाताओं का नई सीटों में वितरण बदल सकता है। हालांकि, ऐसा किस तरह होगा, यह केवल आधिकारिक सीमा निर्धारण के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।

सारण और आरा में क्या बदल सकता है?

सारण में यादव, राजपूत और वैश्य समुदायों के समीकरणों को चुनावी दृष्टि से महत्वपूर्ण बताया गया है। वहीं आरा में सवर्ण, यादव, मुस्लिम और अन्य पिछड़े समुदायों के साथ वामपंथी दलों का प्रभाव भी चर्चा का विषय रहा है।

रिपोर्ट का अनुमान है कि इन क्षेत्रों के विभाजन से राजनीतिक दलों की रणनीति बदल सकती है। लेकिन किसी खास इलाके को अलग करने या मतदाताओं के बंटवारे के जरिए किसी दल को फायदा पहुंचाने के दावों की पुष्टि के लिए ठोस और आधिकारिक जानकारी जरूरी होगी।

झंझारपुर और खगड़िया पर भी रहेंगी नजरें

रिपोर्ट में झंझारपुर और खगड़िया को भी उन 10 संसदीय क्षेत्रों में शामिल किया गया है, जिनके विभाजन की चर्चा है। इन दोनों क्षेत्रों में भी भौगोलिक विस्तार, मतदाताओं की संख्या और स्थानीय सामाजिक समीकरण परिसीमन की बहस में महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

हालांकि, उपलब्ध विवरण में इन दोनों सीटों के प्रस्तावित नए स्वरूप की स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई है। इसलिए इनके संभावित राजनीतिक प्रभाव पर अभी निश्चित निष्कर्ष निकालना संभव नहीं है।

2029 के चुनाव से पहले क्या होगा आगे?

यदि बिहार में लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाने का कोई प्रस्ताव आधिकारिक रूप से आगे बढ़ता है, तो उसकी संवैधानिक प्रक्रिया, संसद की भूमिका और निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं से जुड़े फैसले अहम होंगे। इसके बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि राज्य में कितनी सीटें होंगी और किन इलाकों का पुनर्गठन किया जाएगा।

फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बिहार की 40 सीटों को बढ़ाकर 60 करने और 10 मौजूदा सीटों को तीन हिस्सों में बांटने के दावे को अंतिम फैसला नहीं समझना चाहिए। 2029 के लोकसभा चुनाव में सीटों की संख्या और परिसीमन का वास्तविक स्वरूप आधिकारिक फैसलों पर निर्भर करेगा।

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