Election Commission पर विपक्ष का बड़ा वार! राहुल गांधी ने उठाए गंभीर सवाल, महाभियोग लाने की तैयारी
चुनाव आयोग से जुड़ी एक मीडिया रिपोर्ट के सामने आने के बाद देश की सियासत में आरोप-प्रत्यारोप तेज हो गए हैं. रिपोर्ट में दावा किया गया है कि चुनाव आयोग के दो आयुक्तों ने कुछ फैसलों को लेकर आपत्ति जताई थी. इसी रिपोर्ट को आधार बनाकर लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने 24 सितंबर को प्रेस कॉन्फ्रेंस की और चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर कई सवाल उठाए.
राहुल गांधी ने पावरपॉइंट प्रेजेंटेशन के जरिए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और केंद्र सरकार पर निशाना साधा. उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं और मतदाता सूची से जुड़े मामलों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.
राहुल गांधी ने कहा कि उनके मुताबिक पहले वोट चोरी, फिर कानून और उसके बाद संस्था से जुड़ा सवाल सामने आया है. उन्होंने चुनाव आयोग पर संविधान के खिलाफ काम करने का आरोप लगाते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग भी की.
CEC की नियुक्ति और कानूनी सुरक्षा पर राहुल गांधी के सवाल
राहुल गांधी ने मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति और उन्हें मिलने वाली कानूनी सुरक्षा का मुद्दा भी उठाया. उन्होंने 2023 में बने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम का जिक्र किया.
इस कानून की धारा 16 के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों को उनके आधिकारिक कर्तव्यों के दौरान किए गए कार्यों के संबंध में कुछ कानूनी सुरक्षा दी गई है. इसका मतलब यह है कि उनके आधिकारिक कार्यों को लेकर उनके खिलाफ नागरिक या आपराधिक कार्यवाही पर कानून में विशेष सुरक्षा का प्रावधान है.
राहुल गांधी ने इसी प्रावधान को लेकर सवाल उठाए और आरोप लगाया कि चुनाव आयुक्तों को जवाबदेही से बचाने के लिए कानूनी सुरक्षा दी गई है. इन आरोपों पर सत्ता पक्ष ने अलग रुख अपनाया है.
बीजेपी ने राहुल गांधी के आरोपों को खारिज किया
बीजेपी प्रवक्ता और राज्यसभा सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने राहुल गांधी के आरोपों पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि चुनाव आयोग में फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं. उन्होंने कहा कि आयोग के निर्णय बहुमत के आधार पर लिए जाने का कोई प्रमाण सामने नहीं आया है.
बीजेपी ने राहुल गांधी के आरोपों को राजनीतिक बयानबाजी बताया और कहा कि कांग्रेस चुनावों में अपनी स्थिति को लेकर चुनाव आयोग को निशाना बना रही है.
गोवा के 97 वोटर्स का मामला क्या है?
इस पूरे विवाद में गोवा के 97 मतदाताओं का मामला भी चर्चा में है. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR के दौरान कुछ मतदाताओं के नाम तार्किक या सॉफ्टवेयर संबंधी गड़बड़ियों के चलते सूची से हट गए थे.
बाद में स्थानीय चुनाव अधिकारियों ने दस्तावेजों की जांच की और इन 97 मतदाताओं को योग्य पाया. इसके बाद उनके नाम मतदाता सूची में वापस शामिल किए जाने थे. हालांकि, रिपोर्ट के अनुसार ऐसा नहीं हो सका.
मामले में बताया गया कि ECI-Net सॉफ्टवेयर में स्थानीय अधिकारियों के लिए पहले लिए गए निर्णय को वापस लेने यानी 'रोल बैक' करने का विकल्प उपलब्ध नहीं था. इसके चलते स्थानीय स्तर पर योग्य पाए गए मतदाताओं के नाम दोबारा जोड़ने में परेशानी आई.
सात दिन में भेजे गए आठ ईमेल
रिपोर्ट के मुताबिक, गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय ने सात दिनों के भीतर आठ ईमेल भेजकर ECI-Net में रोल बैक की सुविधा उपलब्ध कराने का अनुरोध किया था.
रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि गोवा के अधिकारियों ने चुनाव आयोग के आईटी विभाग को सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए इस प्रक्रिया को पूरा करने की मांग की थी. इसके बावजूद कथित तौर पर उन्हें आवश्यक सिस्टम एक्सेस नहीं मिला और 97 मतदाताओं के नाम वापस जोड़ने की प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी.
यही मामला अब चुनाव आयोग की तकनीकी व्यवस्था, स्थानीय चुनाव अधिकारियों की भूमिका और मतदाता सूची में सुधार की प्रक्रिया को लेकर बहस का विषय बन गया है.
राहुल गांधी ने चुनावों पर भी उठाए सवाल
राहुल गांधी ने ज्ञानेश कुमार के कार्यकाल में हुए विभिन्न विधानसभा चुनावों का जिक्र करते हुए चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठाए. उन्होंने आरोप लगाया कि इन चुनावों में मतदाताओं के वोट प्रभावित किए गए.
हालांकि, ये राहुल गांधी और कांग्रेस की ओर से लगाए गए आरोप हैं. बीजेपी और चुनाव आयोग की ओर से इन आरोपों को स्वीकार नहीं किया गया है. बीजेपी ने चुनाव आयोग की प्रक्रिया का बचाव करते हुए कहा है कि फैसले नियमों और निर्धारित प्रक्रिया के तहत लिए जाते हैं.
इस पूरे विवाद का केंद्र अब तीन प्रमुख मुद्दे हैं—चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया, मतदाता सूची में बदलाव की व्यवस्था और चुनाव आयुक्तों की जवाबदेही. गोवा के 97 मतदाताओं का मामला सामने आने के बाद ECI-Net जैसे तकनीकी सिस्टम और उसमें स्थानीय अधिकारियों को उपलब्ध अधिकारों को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं.

