Samachar Nama
×

मैं 'बैसाखी', मेरी सुनो....

नई दिल्ली, 13 अप्रैल (आईएएनएस)। भारतवर्ष एक सबल संस्कृति, परंपरा, आस्था और विविधता वाला देश है। अलग-अलग भाषा और बोलियों वाले इस खूबसूरत देश में भांति-भांति के त्योहार मनाए जाते हैं, जिनको विशेष परिस्थिति, वातावरण और देशकाल के साथ पूरे मनोभाव के साथ मनाया जाता है। ऐसे ही त्योहारों में से मैं भी एक हूं...मैं बैसाखी हूं। क्योंकि मेरा अस्तित्व कहीं न कहीं बैसाख के महीने में छिपा है, इसलिए मुझे बैसाखी के रूप में मनाया जाता है, जो वैसाखी का ही अपभ्रंश है।
मैं 'बैसाखी', मेरी सुनो....

नई दिल्ली, 13 अप्रैल (आईएएनएस)। भारतवर्ष एक सबल संस्कृति, परंपरा, आस्था और विविधता वाला देश है। अलग-अलग भाषा और बोलियों वाले इस खूबसूरत देश में भांति-भांति के त्योहार मनाए जाते हैं, जिनको विशेष परिस्थिति, वातावरण और देशकाल के साथ पूरे मनोभाव के साथ मनाया जाता है। ऐसे ही त्योहारों में से मैं भी एक हूं...मैं बैसाखी हूं। क्योंकि मेरा अस्तित्व कहीं न कहीं बैसाख के महीने में छिपा है, इसलिए मुझे बैसाखी के रूप में मनाया जाता है, जो वैसाखी का ही अपभ्रंश है।

यूं तो त्योहार का अर्थ ही अपने आप में खुशियों और उत्साह से जुड़ा है, लेकिन ये मेरा सौभाग्य ही है कि मुझे फसल (रबी) की कटाई के तौर पर याद किया जाता है, जो देश के अन्नदाता की उत्सुकता का प्रतीक है। क्योंकि भारत एक खेती-किसानी वाला देश है और एक किसान दिन-रात मेहनत कर अपनी पसीने से सींची गई फसल के पकने का सालभर इंतजार करता है। ऐसे में फसल की कटाई के समय उसका मनोभाव क्या रहता होगा, इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। खेतों में गेहूं की सुनहरी बालियों को देखकर किसान अपनी सारी मेहनत और थकान को भूलकर मन ही मन मुस्कुराता है...बस मैं उसकी इस उमंग और तरंग वाले मनोभाव की ही एक अभिव्यक्ति हूं।

क्योंकि मैं खेती कामगारों के समृद्धि से जुड़ी हूं, इसलिए मुझे पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में पूरे हर्षोल्लास से मनाए जाने का गौरव प्राप्त है, लेकिन देश के अलग-अलग राज्यों में मुझे भिन्न-भिन्न नामों के माध्यम से याद किया जाता है। तमिलनाडु में मैं पुथंडु के नाम से जानी जाती हूं, जिसको नव वर्ष और खुशहाली का प्रतीक के तौर पर मनाया जाता है, तो वहीं बंगाल में पोइला बैसाख के नाम से लोग मुझे याद करते हैं, जो नई शुरुआत और उत्सव का एक रूप है।

ऐतिहासिक तथ्यों की बात की जाए तो वो मैं ही हूं, जिसकी पावन तिथि पर पंजाब में खालसा पंथ की नींव पड़ी। यह वो समय था जब देश मुगलों के दिए घावों से कराहा रहा था। देश में कट्टरपंथियों द्वारा किया जा रहा उत्पीड़न इतना बढ़ गया था कि इज्जत-आबरू और जीवन कहीं कुछ सुरक्षित नहीं था। ऐसे में सिखों के दसवें गुरु, गुरु गोविंद सिंह, ने अत्याचार के इस चरम के खिलाफ 1699 में खालसा पंथ की स्थापना की। यह सोचकर मेरा भी सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है कि सिख इतिहास में इस घटना को एक क्रांतिकारी मोड़ के रूप में देखा जाता है, जिसने न केवल बुराई के दमन में बड़ा योगदान दिया, बल्कि सिखों को एक नई पहचान, साहस और एकता का संदेश भी दिया। इसलिए मुझे खालसा पंथ के स्थापना दिवस के तौर पर भी याद किया जाता है। इस दिन गुरुद्वारों में कीर्तन, अरदास और लंगर के आयोजन देख मेरी आत्मा ठंडी हो जाती है।

लेकिन खुशियों की इतनी गौरव गाथाओं के साथ, मैं कुछ ऐसी घटनाओं की भी साक्षी हूं, जिनके बारे में सोचकर आज भी मेरा दिल दर्द से सिहर उठता है। 13 अप्रैल 1919 की वो घटना को मैं कैसे भूल सकती हूं, जब अंग्रेजी हुकूमत द्वारा मेरा मान-मर्दन किया गया? इसकी स्मृति भी मेरी आत्मा को कंपा देती है कि कैसे अमृतसर के जलियांवाला बाग में डायर की एक-एक गोली मेरी रूह को छलनी कर रही थी।

उस घटना के बाद मेरी गोद में पड़े सैंकड़ों लोगों के शवों का बोझ मैं आज तक ढो रही हूं। ऐसे में भारतीय इतिहास में एक काले अध्याय के रूप दर्ज यह विभत्स घटना भी मेरे अस्तित्व से जुड़ी है। यही वजह है कि जब-जब जलियांवाला बाग नरसंहार का जिक्र आता है, तो मेरा दर्द मेरी आंखों से आंसू बनकर छलक आता है।

बहरहाल, अपने अस्तित्व और पहचान से जुड़ी इन खट्टी-मिठी यादों के साथ मैं हर क्षण भारतवासियों की खुशियों और समृद्धि की कामना ही करती हूं। इस देश के एक-एक शख्स की हंसी मेरे चेहरे पर प्रसन्नता का भाव लाती है। इसलिए हे जम्बूद्वीप...हे आर्यवर्त...हे भारतवर्ष, तेरी भूमी ऐसे पकी फसलों से लहलाती रहे, तेरा आकाश हमेशा खुशियों के बादल बरसाता रहे...तेरे छतनार वृक्ष हमेशा रसदार फलों से लदे रहें, बस यही मेरा कामना है।

--आईएएनएस

एमएस/डीकेपी

Share this story

Tags