योगेश कथुनिया: माता-पिता डॉक्टर बनाना चाहते थे, बेटे ने डिस्कस थ्रो में देश को दिलाया पदक
नई दिल्ली, 2 मार्च (आईएएनएस)। योगेश कथुनिया देश के एक प्रसिद्ध पैराएथलीट हैं। उनके माता-पिता चाहते थे कि वह डॉक्टर बनें, लेकिन योगेश ने खेल के क्षेत्र में बड़ा नाम कमाया है और देश को पैरालंपिक में रजत पदक दिलाया है।
डिस्कस थ्रोअर के खिलाड़ी योगेश कथुनिया का जन्म 3 मार्च 1997 को बहादुरगढ़, हरियाणा में हुआ था। योगेश के माता-पिता चाहते थे कि वह डॉक्टर बने, लेकिन 9 साल की उम्र में पता चला कि उन्हें गुइलेन-बैरे सिंड्रोम नामक खतरनाक बीमारी है। यह न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर है। इससे शरीर की गति प्रभावित होती है और मांसपेशियां कमजोर हो जाती हैं। व्यक्ति अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो पाता। योगेश के साथ भी ऐसा ही था, लेकिन फिजियोथेरेपी की मदद से वह बैसाखी के सहारे खड़े हुए। इसमें उनकी मां मीना देवी का अहम योगदान रहा।
योगेश कथुनिया की रुचि खेल में थी। 2016 में, किरोड़ीमल कॉलेज में छात्र संघ के महासचिव सचिन यादव ने उन्हें पैरा एथलीटों के वीडियो दिखाकर खेलों में शामिल होने के लिए प्रेरित किया, जिसके बाद कथुनिया ने पैरा स्पोर्ट्स में कदम रखा। 2018 में, उन्होंने बर्लिन में 2018 वर्ल्ड पैरा एथलेटिक्स यूरोपियन चैंपियनशिप में एफ36 कैटेगरी में 45.18 मीटर तक डिस्कस थ्रो करके विश्व रिकॉर्ड बनाया।
कथुनिया ने 2020 समर पैरालिंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व किया और डिस्कस थ्रो एफ56 इवेंट में रजत पदक जीता। नवंबर 2021 में, भारत के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने कथुनिया को 2020 समर पैरालिंपिक में उनके रजत पदक के लिए अर्जुन अवॉर्ड से सम्मानित किया।
2022 में योगेश को एक और झटका लगा। उन्हें सर्वाइकल रेडिकुलोपैथी का पता चला। ये रीढ़ की हड्डी को प्रभावित करने वाली एक नर्व कंडिशन है। उन्हें ठीक होने में छह महीने लग गए।
2024 समर पैरालिंपिक में उन्होंने भारत का प्रतिनिधित्व किया और फिर से डिस्कस थ्रो एफ56 इवेंट में रजत पदक जीता। उन्होंने 2025 विश्व पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप में प्रतिस्पर्धा की और डिस्कस थ्रो एफ56 स्पर्धा में रजत पदक जीता।
योगेश कथुनिया की जिंदगी शारीरिक अक्षमता के बावजूद बड़ा लक्ष्य तय करने और उसे पा लेने का जीवंत उदाहरण है।
--आईएएनएस
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