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यादों में महेंद्र : देशभक्ति की आवाज, जो हर बार 'अजनबी' बनने के लिए रही 'बेचैन'

मुंबई, 8 जनवरी (आईएएनएस)। यह बात 1957 की है, जब मुंबई का 'मेट्रो' सिनेमा हॉल खचाखच भरा हुआ था। मंच पर नौशाद अली, अनिल बिस्वास, सी रामचंद्र और मदन मोहन जैसे दिग्गज संगीतकार बैठे थे। 'मर्फी ऑल इंडिया गायन प्रतियोगिता' का आयोजन हो रहा था। उसी वक्त एक नौजवान मंच पर आया और जैसे ही उसने "इलाही कोई तमन्ना नहीं जमाने में, मेरी जवानी तो गुजरी शराबखाने में..." गीत गाया, पूरा हॉल सन्न रह गया।
यादों में महेंद्र : देशभक्ति की आवाज, जो हर बार 'अजनबी' बनने के लिए रही 'बेचैन'

मुंबई, 8 जनवरी (आईएएनएस)। यह बात 1957 की है, जब मुंबई का 'मेट्रो' सिनेमा हॉल खचाखच भरा हुआ था। मंच पर नौशाद अली, अनिल बिस्वास, सी रामचंद्र और मदन मोहन जैसे दिग्गज संगीतकार बैठे थे। 'मर्फी ऑल इंडिया गायन प्रतियोगिता' का आयोजन हो रहा था। उसी वक्त एक नौजवान मंच पर आया और जैसे ही उसने "इलाही कोई तमन्ना नहीं जमाने में, मेरी जवानी तो गुजरी शराबखाने में..." गीत गाया, पूरा हॉल सन्न रह गया।

जजों की आंखों में चमक थी, लेकिन पर्दे के पीछे साजिशें भी कम नहीं थीं। एक प्रतिद्वंद्वी ने आरोप लगाया कि यह लड़का पेशेवर गायक है, उसने एक फिल्म में गाया है। मामला इतना बढ़ा कि नौजवान का करियर शुरू होने से पहले ही खत्म हो जाता, अगर अनिल बिस्वास ढाल बनकर खड़े न होते। वह नौजवान न केवल विजेता बना, बल्कि भारतीय संगीत के आकाश पर 'महेंद्र कपूर' नाम का सूरज बनकर चमका।

9 जनवरी 1934 को अमृतसर में जन्म लेने वाले महेंद्र कपूर का परिवार कपड़ों के व्यापार से जुड़ा था। लेकिन महेंद्र के कानों में संगीत की झंकार गूंजती थी। जब परिवार मुंबई आया, तो महेंद्र कपूर के लिए सपनों के द्वार खुल गए। वे मोहम्मद रफी को अपना 'गुरु' मानते थे।

महेंद्र कपूर ने शास्त्रीय संगीत की ऐसी सुदृढ़ नींव तैयार की, जो आज के दौर के गायकों के लिए एक मिसाल है। पंडित हुस्नलाल, उस्ताद नियाज अहमद खान और उस्ताद अब्दुल रहमान खान जैसे दिग्गजों से मिली सीख ने उनकी आवाज को वह 'मस्कुलरिटी' और 'रेजोनेंस' दिया, जो आगे चलकर उनकी पहचान बनी।

वे जब हाई पिच पर गाते थे, तो सुनने वाले हैरान रह जाते थे। फिल्म 'नवरंग' का 'आधा है चंद्रमा रात आधी' हो या 'गुमराह' का कालजयी गीत 'चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों,' उनकी आवाज में विरह और मिलन के भाव एक साथ बहते थे।

1967 में आई फिल्म 'उपकार' के लिए जब उन्होंने 'मेरे देश की धरती' गाया, तो यह केवल एक गाना नहीं, बल्कि देशभक्ति का 'सिग्नेचर टोन' बन गया।

फिल्म जगत में महेंद्र कपूर का सबसे सफल जुड़ाव बीआर चोपड़ा और संगीतकार रवि के साथ रहा। जब रफी साहब और चोपड़ा साहब के बीच कुछ वैचारिक मतभेद हुए, तो महेंद्र कपूर को 'हमराज' और 'गुमराह' जैसी फिल्मों में अपनी संगीत कला दिखाने का मौका मिला। 'नीले गगन के तले' जैसे गीतों ने उन्हें फिल्मफेयर की ट्राफियां दिलाईं।

1980 के दशक के अंत में जब पूरा भारत रविवार की सुबह सड़कों से गायब होकर टेलीविजन के सामने बैठ जाता था, तब जो पहली आवाज कानों में पड़ती थी, वह थी, "अथ श्री महाभारत कथा..."। बीआर चोपड़ा की 'महाभारत' में महेंद्र कपूर के गाए दोहे और श्लोक आज भी लोगों के जेहन में रचे-बसे हैं। 'यदा यदा ही धर्मस्य' को उन्होंने जिस गंभीरता और भक्ति के साथ स्वर दिया, उसने उन्हें घर-घर में अमर कर दिया।

महेंद्र कपूर केवल हिंदी तक सीमित नहीं रहे। उन्होंने मराठी सिनेमा में दादा कोंडके की आवाज बनकर धूम मचाई। इतना ही नहीं, वे पहले भारतीय पार्श्व गायक थे, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 'बोनी एम' के साथ 'एम-3' एल्बम के लिए पॉप गीत रिकॉर्ड किए। वे गुजराती फिल्मों के लिए लगातार छह वर्षों तक राज्य पुरस्कार जीतते रहे।

उन्होंने हमेशा मोहम्मद रफी को अपना गुरु माना। 27 सितंबर 2008 को उनकी हृदय गति रुकने से मृत्यु हो गई।

--आईएएनएस

वीकेयू/एबीएम

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