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यादों में गोपाल : छऊ नृत्य के संरक्षक गोपाल प्रसाद दुबे, मुखौटा कला को दिया नया आयाम

नई दिल्ली, 24 जून (आईएएनएस)। 25 जून 1957 को झारखंड के सरायकेला में एक ब्राह्मण परिवार में जन्मे गोपाल प्रसाद दुबे का बचपन छऊ की गूंजती धुनों और मुखौटों की रहस्यमयी दुनिया के बीच बीता। उनके दादा शशिभूषण दुबे शाही सिंह देव राजवंश के दरबार में अभिनेता थे, जिन्होंने महज नौ वर्ष की आयु में गोपाल को कला की पहली दीक्षा दी। धीरे-धीरे यह बाल सुलभ आकर्षण एक ऐसी कठोर साधना में बदल गया, जिसने छऊ के इतिहास को हमेशा के लिए बदल दिया।
यादों में गोपाल : छऊ नृत्य के संरक्षक गोपाल प्रसाद दुबे, मुखौटा कला को दिया नया आयाम

नई दिल्ली, 24 जून (आईएएनएस)। 25 जून 1957 को झारखंड के सरायकेला में एक ब्राह्मण परिवार में जन्मे गोपाल प्रसाद दुबे का बचपन छऊ की गूंजती धुनों और मुखौटों की रहस्यमयी दुनिया के बीच बीता। उनके दादा शशिभूषण दुबे शाही सिंह देव राजवंश के दरबार में अभिनेता थे, जिन्होंने महज नौ वर्ष की आयु में गोपाल को कला की पहली दीक्षा दी। धीरे-धीरे यह बाल सुलभ आकर्षण एक ऐसी कठोर साधना में बदल गया, जिसने छऊ के इतिहास को हमेशा के लिए बदल दिया।

बता दें कि छऊ पूर्वी भारत का एक प्रसिद्ध और ऊर्जावान अर्ध-शास्त्रीय नृत्य है, जो अपने कलाबाज़ियों और मार्शल आर्ट (युद्ध-कला) के तत्वों के लिए जाना जाता है।

14 वर्ष की आयु से उन्होंने पारंपरिक 'अखाड़ों' में कदम रखा। उन्होंने गुरु नटशेखर बनबिहारी पटनायक से शारीरिक संतुलन और चपलता सीखी और गुरु पद्मश्री केदारनाथ साहू से जटिल लयबद्ध हस्त मुद्राओं का ज्ञान पाया। उन्होंने प्रसिद्ध अमेरिकी नर्तकी शेरॉन लॉयन से ओडिसी नृत्य भी सीखा।

मूल रूप से 'परिकंडा' (ढाल और तलवार) नामक पारंपरिक युद्ध-कला से उपजा छऊ नृत्य, सरायकेला शैली में आकर बेहद कोमल और अमूर्त हो गया। इस शैली का प्राण इसके मुखौटे हैं। मुखौटा पहनने के बाद 'दृष्टि भेद' (आंखों के भाव) समाप्त हो जाता है, इसलिए नर्तक को अपनी पूरी संवेदना 'ग्रीवा भेद' (गर्दन के मूवमेंट) और शारीरिक चाल-ढाल से संप्रेषित करनी होती है।

पंडित गोपाल प्रसाद दुबे इस लुप्तप्राय मुखौटा निर्माण कला के बड़े संरक्षक थे। खरकाई नदी की उपजाऊ काली मिट्टी से सांचे (माटिर मुहा) को गढ़ना, गोबर की राख का छिड़काव, मैदा के गोंद से कागज की परतें चढ़ाना और अंत में खड़िया मिट्टी के लेप पर सजीव पेस्टल रंग चढ़ाना—यह पूरी प्रक्रिया किसी साधना से कम नहीं है। भगवान कृष्ण के लिए नीला, राम के लिए हरा और शांत पात्रों के लिए हल्के गुलाबी रंगों का यह अनूठा चयन नर्तक के चरित्र को बिना बोले ही दर्शकों के सामने उजागर कर देता था।

1986 में एशियन कल्चरल काउंसिल की फेलोशिप पाकर जब वे न्यू यॉर्क गए, तो उन्होंने आधुनिक पश्चिमी रंगमंच और समकालीन कोरियोग्राफी का बारीकी से अध्ययन किया। इसके बाद उन्होंने पूर्व और पश्चिम की कलात्मक संस्कृतियों के बीच एक ऐतिहासिक संवाद स्थापित किया।

हार्वर्ड, यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन और शिकागो जैसे वैश्विक संस्थानों में अध्यापन करते हुए, उन्होंने दुनिया को सिखाया कि कैसे एक मुखौटा मनुष्य के अहंकार को ढककर उसकी आत्मा को नृत्य करने के लिए स्वतंत्र कर देता है। उन्होंने सरायकेला, मयूरभंज और पुरुलिया तीनों शैलियों के लिए पहला औपचारिक पाठ्यक्रम तैयार करने में भी ऐतिहासिक भूमिका निभाई।

14 नवंबर 2022 को पंडित गोपाल प्रसाद दुबे इस संसार को विदा कह गए, लेकिन उनकी विरासत आज भी त्रिनेत्र छऊ डांस सेंटर के माध्यम से उनके भाई सुनील दुबे और शिष्यों के रूप में जीवित है।

--आईएएनएस

वीकेयू/पीएम

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