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विश्व गौरैया दिवस: घटती संख्या के बीच छोटे पक्षियों को बचाने का वैश्विक प्रयास

नई दिल्ली, 19 मार्च (आईएएनएस)। गांवों की शांत सुबह से लेकर शहरों की चहल-पहल तक, छोटी-छोटी गौरैया की मधुर चहचहाहट कभी हर जगह गूंजती थी। ये नन्हीं चिड़िया बिना बुलाए ही घरों के आंगन और छत पर आ जाती थी, और उनके झुंड यादगार पल बनाते थे, लेकिन आज ये हमारे आसपास से लगभग गायब हो चुकी हैं। कई इलाकों में गौरैया अब दुर्लभ हो गई हैं। इन्हें बचाने और जागरूकता फैलाने के लिए हर साल 20 मार्च को विश्व गौरैया दिवस मनाया जाता है।
विश्व गौरैया दिवस: घटती संख्या के बीच छोटे पक्षियों को बचाने का वैश्विक प्रयास

नई दिल्ली, 19 मार्च (आईएएनएस)। गांवों की शांत सुबह से लेकर शहरों की चहल-पहल तक, छोटी-छोटी गौरैया की मधुर चहचहाहट कभी हर जगह गूंजती थी। ये नन्हीं चिड़िया बिना बुलाए ही घरों के आंगन और छत पर आ जाती थी, और उनके झुंड यादगार पल बनाते थे, लेकिन आज ये हमारे आसपास से लगभग गायब हो चुकी हैं। कई इलाकों में गौरैया अब दुर्लभ हो गई हैं। इन्हें बचाने और जागरूकता फैलाने के लिए हर साल 20 मार्च को विश्व गौरैया दिवस मनाया जाता है।

विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत साल 2010 में पक्षी संरक्षण संगठन 'नेचर फॉरएवर' द्वारा की गई थी। अब यह 50 से ज्यादा देशों में मनाया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य गौरैया की तेजी से घटती संख्या के बारे में लोगों को बताना और उनके संरक्षण के लिए कदम उठाना है। साल 2012 में दिल्ली ने गौरैया को अपना राज्य पक्षी घोषित किया, जिससे इस मुद्दे को और मजबूती मिली। गौरैया दिखने में छोटी लेकिन बहुत महत्वपूर्ण हैं। ये इकोसिस्टम के लिए बेहद आवश्यक हैं। ये कीड़े-मकोड़ों को खाकर उनकी संख्या नियंत्रित रखती हैं, जिससे फसलों और पर्यावरण को फायदा होता है। साथ ही परागण और बीज फैलाने में भी मदद करती हैं। ग्रामीण और शहरी दोनों जगहों पर जैव विविधता बनाए रखने में इनकी बड़ी भूमिका है।

भारत में गौरैया सिर्फ पक्षी नहीं, बल्कि संस्कृति का हिस्सा हैं। हिंदी में 'गोरैया', तमिल में 'कुरुवी', और उर्दू में 'चिर्या' कहलाती हैं। पीढ़ियों से ये घरों में खुशियां बिखेरती आई हैं, लेकिन गौरैया की संख्या चिंताजनक तरीके से घट रही है। इसके पीछे कई कारण हैं, जैसे शहरीकरण, आधुनिक इमारतों में घोंसला बनाने की जगह नहीं मिलती, और पुरानी दीवारों और छतों की जगह कंक्रीट आ गया। दूसरा है प्रदूषण, सीसा रहित पेट्रोल से निकलने वाले विषैले पदार्थ उन कीड़ों को मार देते हैं, जिन पर गौरैया भोजन के लिए निर्भर हैं।

खेती में ज्यादा कीटनाशकों से कीट कम हो गए, जिससे गौरैयों को भोजन नहीं मिलता। इसके अलावा, कौवों-बिल्लियों की बढ़ती संख्या, हरे-भरे स्थानों की कमी और जीवनशैली में बदलाव भी शामिल हैं। इन चुनौतियों के बावजूद नन्हीं चिड़िया को बचाने के कई प्रयास हो रहे हैं। सेव द स्पैरो अभियान जगत किंखाबवाला चला रहे हैं, जिसे 2017 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का समर्थन मिला।

चेन्नई के कूदुगल ट्रस्ट ने स्कूली बच्चों से 2020-2024 तक 10,000 से ज्यादा घोंसले बनवाए, जिससे स्थानीय स्तर पर गौरैयों की संख्या बढ़ी। कर्नाटक के मैसूर में अर्ली बर्ड कार्यक्रम बच्चों को पक्षियों से जोड़ता है– पुस्तकालय, एक्टिविटी किट और गांवों में पक्षी देखने की यात्राएं शामिल हैं। नन्हीं चिड़िया को बचाने के लिए आमजन भी छोटे कदम उठा सकते हैं, जैसे घरों में दाना-पानी रखें, पेड़-पौधे लगाएं, कीटनाशकों का कम इस्तेमाल करें और घोंसले बनाने के लिए सुरक्षित जगह बनाएं।

--आईएएनएस

एमटी/डीकेपी

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