8 साल में दोगुनी हुईं कामकाजी महिलाएं, 20 करोड़ के पार पहुंची संख्या: वीडियो में जाने घर और नौकरी की दोहरी जिम्मेदारी से रोज 70 मिनट कम मिल रहा आराम
देश में कामकाजी महिलाओं की संख्या पिछले आठ साल में दोगुनी होकर 20 करोड़ के पार पहुंच गई है। महिलाएं अब बड़ी संख्या में घर से बाहर निकलकर नौकरी और आजीविका से जुड़ रही हैं, लेकिन उनकी जिंदगी पहले के मुकाबले ज्यादा व्यस्त हो गई है। रोजगार में महिलाओं की भागीदारी बढ़ने के बावजूद घर और बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारी में पुरुषों की हिस्सेदारी उसी अनुपात में नहीं बढ़ी है। इसका नतीजा यह है कि महिलाओं को घर और बाहर दोनों जगह की जिम्मेदारियां निभानी पड़ रही हैं।
आंकड़ों के मुताबिक, घर और नौकरी के बीच तालमेल बैठाने के कारण महिलाओं को आराम, नींद और अपने लिए पुरुषों की तुलना में रोजाना करीब 70 मिनट कम समय मिल रहा है। यानी आर्थिक गतिविधियों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है, लेकिन घरेलू जिम्मेदारियों का बोझ अब भी मुख्य रूप से उन्हीं पर है।
गांवों में कामकाजी महिलाओं की संख्या में सबसे ज्यादा उछाल
शहरी क्षेत्रों के मुकाबले ग्रामीण इलाकों में कामकाजी महिलाओं की संख्या में ज्यादा बढ़ोतरी दर्ज की गई है। ग्रामीण क्षेत्रों में महिला कामगारों की भागीदारी 23.7 प्रतिशत से बढ़कर 44.9 प्रतिशत हो गई है। वहीं, शहरी क्षेत्रों में यह आंकड़ा 18.2 प्रतिशत से बढ़कर 25.9 प्रतिशत तक पहुंचा है।
ग्रामीण इलाकों में काम करने वाली महिलाओं का बड़ा हिस्सा खेती-किसानी से जुड़ा हुआ है। आंकड़ों के अनुसार, गांवों में काम करने वाली 73.3 प्रतिशत महिलाएं कृषि क्षेत्र में काम करती हैं। इसके मुकाबले कृषि क्षेत्र में पुरुषों की हिस्सेदारी 47.2 प्रतिशत है। इससे पता चलता है कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महिलाओं की भूमिका काफी महत्वपूर्ण है।
महिलाओं को पुरुषों के मुकाबले कम वेतन
कामकाज में महिलाओं की भागीदारी बढ़ने के बावजूद वेतन के मामले में असमानता बनी हुई है। ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं को पुरुषों की तुलना में औसतन केवल 45 प्रतिशत वेतन मिलता है। वहीं, शहरी इलाकों में महिलाओं की औसत कमाई पुरुषों के वेतन का करीब 61 प्रतिशत है।ये आंकड़े बताते हैं कि रोजगार में महिलाओं की संख्या बढ़ने के साथ उनकी आर्थिक स्थिति में समानता पने आप नहीं आई है। समान काम और भागीदारी के बावजूद महिलाओं की कमाई पुरुषों से काफी कम बनी हुई है।
घर और बच्चों की जिम्मेदारी से रोजगार छोड़ने को मजबूर महिलाएं
महिलाओं के रोजगार से जुड़ी एक बड़ी चुनौती घरेलू जिम्मेदारियां भी हैं। आंकड़ों के मुताबिक, करीब 60 प्रतिशत महिलाओं ने माना कि घर और बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारी के कारण उन्हें नियमित रोजगार से बाहर रहना पड़ता है। इसके मुकाबले पुरुषों में ऐसा कहने वालों की संख्या केवल 1 प्रतिशत है।इससे साफ होता है कि महिलाओं के लिए नौकरी करना केवल रोजगार पाने तक सीमित नहीं है। उन्हें काम के साथ घर, बच्चों और परिवार की देखभाल भी करनी पड़ती है। वहीं, पुरुषों पर घरेलू जिम्मेदारियों का दबाव तुलनात्मक रूप से काफी कम है।
रोजगार बढ़ा, लेकिन घरेलू जिम्मेदारियों में बराबरी नहीं
कामकाजी महिलाओं की संख्या में बढ़ोतरी देश में बदलती आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों को दिखाती है। महिलाएं खेती, नौकरी और दूसरे आजीविका के साधनों से जुड़ रही हैं। इसके बावजूद घरेलू कामों में पुरुषों की भागीदारी बढ़ाए बिना महिलाओं पर दोहरा बोझ कम करना मुश्किल है।महिलाओं को रोजगार में समान अवसर देने के साथ घर और बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारी भी साझा करनी होगी। इसके अलावा समान काम के लिए समान वेतन और कामकाजी महिलाओं के लिए बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराना भी जरूरी है। तभी महिलाओं की बढ़ती आर्थिक भागीदारी उनके जीवन में वास्तविक राहत और समानता ला सकेगी।

