महिलाओं के खिलाफ अपराध में कौन सा राज्य आगे, बिहार की स्थिति कितनी अलग? समझें आंकड़ों का पूरा गणित
बिहार के जमुई में नाबालिग छात्र-छात्रा के साथ कथित बदसलूकी का वीडियो सामने आने के बाद महिला और बालिका सुरक्षा को लेकर बहस फिर तेज हो गई है। पुलिस ने मामले में कार्रवाई करते हुए आरोपियों को गिरफ्तार किया है और जांच जारी है। इस घटना के बीच यह सवाल भी उठता है कि देश में महिलाओं के खिलाफ अपराध की स्थिति अलग-अलग राज्यों में कैसी है और बिहार का स्थान कहां है?
महिलाओं की सुरक्षा से जुड़े आंकड़ों को समझने के लिए सिर्फ किसी राज्य में दर्ज मामलों की कुल संख्या देखना पर्याप्त नहीं है। आबादी के आकार के कारण बड़े राज्यों में मामलों की संख्या स्वाभाविक रूप से अधिक हो सकती है। इसलिए कुल मामलों के साथ प्रति एक लाख महिला आबादी पर अपराध दर को भी देखना जरूरी होता है।
अपराध दर और कुल मामलों में क्या अंतर है?
महिलाओं के खिलाफ अपराध के आंकड़ों को मुख्य रूप से दो तरीकों से देखा जा सकता है।
अपराध दर: प्रति एक लाख महिला आबादी पर दर्ज मामलों की संख्या। इससे अलग-अलग आबादी वाले राज्यों की तुलना करने में मदद मिलती है।
कुल दर्ज मामले: किसी राज्य में एक साल के दौरान दर्ज हुए मामलों की संख्या। इसमें बड़े राज्यों की आबादी का प्रभाव काफी पड़ सकता है।
इसी वजह से केवल कुल मामलों के आधार पर किसी राज्य को महिलाओं के लिए अधिक या कम सुरक्षित बताना आंकड़ों की पूरी तस्वीर नहीं देता।
किन राज्यों में अपराध दर अधिक दर्ज हुई?
आपके दिए आंकड़ों के अनुसार महिलाओं के खिलाफ अपराध की दर के मामले में कुछ राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में अपेक्षाकृत अधिक आंकड़े दर्ज हुए थे।
राज्य/केंद्र शासित प्रदेश प्रति 1 लाख महिलाओं पर अपराध दर
दिल्ली 130.7
तेलंगाना 128.6
ओडिशा 118.3
हरियाणा 96.4
राजस्थान 91.3
इन आंकड़ों का अर्थ यह है कि संबंधित अवधि में इन स्थानों पर प्रति एक लाख महिला आबादी के मुकाबले दर्ज मामलों की दर अधिक रही। हालांकि, अपराध दर को सीधे महिलाओं की वास्तविक सुरक्षा का पूर्ण पैमाना नहीं माना जा सकता, क्योंकि FIR दर्ज होने की प्रवृत्ति, पुलिस तक पहुंच और रिपोर्टिंग के स्तर जैसे कारक भी आंकड़ों को प्रभावित कर सकते हैं।
कुल मामलों में बड़े राज्यों का आंकड़ा ज्यादा
यदि कुल दर्ज मामलों को देखें तो बड़ी आबादी वाले राज्यों में संख्या अधिक दिखाई देती है। आपके दिए आंकड़ों के मुताबिक सूची में उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, पश्चिम बंगाल और मध्य प्रदेश जैसे राज्य शामिल हैं।
राज्य कुल दर्ज मामले
उत्तर प्रदेश 66,398
महाराष्ट्र 47,954
राजस्थान 36,563
पश्चिम बंगाल 34,000+
मध्य प्रदेश 32,000+
इसलिए कुल संख्या और अपराध दर को अलग-अलग समझना जरूरी है। किसी राज्य में कुल मामले अधिक होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि वहां प्रति महिला अपराध दर भी सबसे अधिक है।
बिहार में क्या स्थिति है?
बिहार की तस्वीर भी इसी तरह अलग-अलग आंकड़ों को साथ रखकर समझने की जरूरत है। आपके दिए आंकड़ों के अनुसार एक अवधि में बिहार में महिलाओं के खिलाफ अपराध के कुल 89,038 मामले दर्ज किए गए थे। वहीं प्रति लाख महिला आबादी पर कुल अपराध दर करीब 31 से 32 के आसपास बताई गई, जो उस तुलना में राष्ट्रीय औसत से कम थी।
लेकिन कुछ विशेष अपराध श्रेणियों में बिहार के आंकड़े महत्वपूर्ण रहे हैं।
शादी के लिए अपहरण के मामले क्यों चर्चा में हैं?
बिहार में महिलाओं और लड़कियों के अपहरण तथा शादी के लिए उन्हें ले जाने से जुड़े मामले लंबे समय से चर्चा का विषय रहे हैं। आपके दिए आंकड़ों के अनुसार संबंधित अवधि में जबरन शादी के उद्देश्य से अपहरण की श्रेणी में बिहार में 4,941 मामले दर्ज किए गए थे।
2022 में अपहृत महिलाओं की संख्या 10,190 तक पहुंचने का भी उल्लेख किया गया है। ये आंकड़े बताते हैं कि महिलाओं के खिलाफ अपराध को केवल छेड़छाड़ या यौन अपराध के नजरिए से देखना पर्याप्त नहीं है। अपहरण, घरेलू हिंसा, यौन अपराध और अन्य श्रेणियां भी महत्वपूर्ण हैं।
बिहार में महिलाओं के खिलाफ अपराध का पैटर्न
बिहार में दर्ज मामलों में कुछ प्रमुख श्रेणियां सामने आती हैं—
अपहरण और भगा ले जाना: महिलाओं से जुड़े मामलों में यह एक महत्वपूर्ण श्रेणी रही है।
पति या रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता: घरेलू हिंसा से जुड़े मामलों में यह प्रमुख श्रेणियों में शामिल है।
यौन अपराध: इसमें छेड़छाड़ से जुड़े अपराध और बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों के मामलों में POCSO कानून के तहत दर्ज केस भी शामिल हो सकते हैं।
इसलिए बिहार की स्थिति समझने के लिए केवल एक अपराध श्रेणी या किसी एक वायरल घटना के आधार पर निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
NCRB आंकड़ों को समझते समय यह बात भी जरूरी
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े दर्ज मामलों पर आधारित होते हैं। इसका मतलब यह है कि आंकड़ों में वही घटनाएं शामिल होती हैं जो पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज हुई हैं। वास्तविक घटनाओं की संख्या इससे अलग हो सकती है, क्योंकि हर घटना की रिपोर्ट पुलिस तक पहुंचे, यह जरूरी नहीं।
इसी तरह किसी राज्य में FIR की संख्या अधिक होना कभी-कभी बेहतर रिपोर्टिंग और शिकायत दर्ज कराने की अधिक प्रवृत्ति को भी दर्शा सकता है। इसलिए अपराध के आंकड़ों को जनसंख्या, रिपोर्टिंग और अपराध की श्रेणी के संदर्भ में पढ़ना जरूरी है।
Jamui घटना के बाद फिर उठा महिला सुरक्षा का सवाल
जमुई की घटना ने एक बार फिर यह सवाल सामने रखा है कि कानून और आंकड़ों के साथ-साथ जमीन पर महिलाओं और नाबालिगों की सुरक्षा किस तरह सुनिश्चित की जा रही है। इस मामले में पुलिस की ओर से गिरफ्तारी और आगे की जांच की कार्रवाई की जा रही है।
वहीं, राष्ट्रीय स्तर पर महिलाओं के खिलाफ अपराध के आंकड़ों को समझते समय कुल मामलों, अपराध दर और अपराध की प्रकृति—तीनों को साथ देखना जरूरी है। किसी एक राज्य को केवल एक आंकड़े के आधार पर महिलाओं के लिए “सबसे असुरक्षित” कहना पूरी तस्वीर पेश नहीं करता।

