दुनिया भर के मौसम वैज्ञानिकों की नजर अक्सर अल नीनो (El Niño) पर रहती है, क्योंकि यह एक ऐसी जलवायु घटना है जो वैश्विक मौसम पैटर्न को प्रभावित करने की क्षमता रखती है। इसके प्रभाव से कई देशों में बारिश, तापमान और सूखे की स्थिति में बड़े बदलाव देखे जा सकते हैं।
क्या होता है अल नीनो?
अल नीनो मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह के तापमान के सामान्य से अधिक गर्म होने की स्थिति है। यह घटना समय-समय पर विकसित होती है और आमतौर पर हर 2 से 7 वर्षों के बीच देखने को मिलती है।
जब समुद्र की सतह का तापमान बढ़ता है, तो वायुमंडलीय दबाव और हवाओं के पैटर्न में बदलाव आने लगता है। इसके कारण वर्षा और मौसम प्रणालियों का सामान्य चक्र प्रभावित हो जाता है।
कैसे प्रभावित होता है मौसम?
अल नीनो के दौरान प्रशांत महासागर के ऊपर बनने वाली मौसम प्रणालियों में बदलाव आता है, जिसका असर दुनिया के कई हिस्सों में देखने को मिलता है।
- कुछ क्षेत्रों में सामान्य से कम बारिश होती है।
- कई देशों में सूखे की स्थिति पैदा हो सकती है।
- कुछ क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा और बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है।
- वैश्विक तापमान में वृद्धि दर्ज की जा सकती है।
- कृषि उत्पादन और जल संसाधनों पर असर पड़ सकता है।
भारत पर क्या पड़ता है असर?
भारत में अल नीनो का सबसे बड़ा प्रभाव दक्षिण-पश्चिम मानसून पर पड़ता है। कई बार अल नीनो के कारण मानसूनी वर्षा सामान्य से कम हो जाती है, जिससे कृषि क्षेत्र प्रभावित हो सकता है। हालांकि हर अल नीनो वर्ष में एक जैसा प्रभाव नहीं होता और इसके असर की तीव्रता अलग-अलग हो सकती है।
कृषि और अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
मानसून आधारित कृषि वाले देशों में अल नीनो का असर अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। बारिश में कमी आने पर फसलों का उत्पादन प्रभावित हो सकता है, जिससे खाद्य कीमतों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी असर पड़ सकता है।
ला नीना से है उल्टा संबंध
अल नीनो के विपरीत स्थिति को ला नीना (La Niña) कहा जाता है। इसमें प्रशांत महासागर के वही क्षेत्र सामान्य से अधिक ठंडे हो जाते हैं। ला नीना अक्सर अधिक वर्षा और अपेक्षाकृत ठंडे वैश्विक तापमान से जुड़ी होती है।

