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नेपाल की बाढ़ से सहमा पश्चिम बंगाल! तीस्ता का जलस्तर बढ़ा, क्या फिर आ सकती है विनाशकारी आपदा?

नेपाल की बाढ़ से सहमा पश्चिम बंगाल! तीस्ता का जलस्तर बढ़ा, क्या फिर आ सकती है विनाशकारी आपदा?

नेपाल में आई भीषण बाढ़ ने भारी तबाही मचाई है। इस आपदा में 900 से ज्यादा लोगों की मौत होने और हजारों लोगों के लापता होने की खबर है। शुरुआती जानकारी के मुताबिक, नेपाल-तिब्बत सीमा के पास ग्लेशियर, चट्टान और बर्फ के बड़े हिस्से के टूटकर नदी में गिरने के बाद अचानक तेज पानी और मलबे का बहाव शुरू हुआ।

नेपाल की इस घटना ने एक बार फिर पूरे पूर्वी हिमालय में बढ़ते प्राकृतिक आपदाओं के खतरे की ओर विशेषज्ञों का ध्यान खींचा है। विशेषज्ञों के मुताबिक, यहां खतरा केवल बाढ़ या भूस्खलन तक सीमित नहीं है। एक आपदा दूसरी आपदा को जन्म दे सकती है।

एक आपदा के बाद दूसरी तबाही का खतरा

विशेषज्ञों का कहना है कि हिमालय जैसे संवेदनशील इलाके में भूकंप, भूस्खलन और अचानक आने वाली बाढ़ एक-दूसरे से जुड़ी हो सकती हैं। उदाहरण के लिए, भूकंप से पहाड़ी ढलान कमजोर हो सकती है और बड़े पैमाने पर भूस्खलन हो सकता है।

इसके बाद मलबे के कारण नदी का रास्ता रुक सकता है और वहां एक अस्थायी झील बन सकती है। अगर यह झील अचानक टूटती है तो पानी और मलबे की तेज लहर नीचे बसे इलाकों में भारी तबाही मचा सकती है। ऐसी घटनाओं को ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF के खतरे से भी जोड़ा जाता है।

नेपाल में आखिर कैसे आई इतनी भीषण बाढ़?

रिपोर्टों के मुताबिक, नेपाल-तिब्बत सीमा के पास ग्लेशियर, चट्टान और बर्फ का एक बड़ा हिस्सा टूटकर ल्हेंडे खोला नदी में जा गिरा। इसके बाद पानी और मलबा बेहद तेजी से घाटियों और आसपास की बस्तियों की तरफ बढ़ा।

शुरुआत में इस घटना को भूकंप से जोड़कर देखा गया था, लेकिन अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (USGS) के विश्लेषण के बाद संकेत मिले कि दर्ज हुई भूकंप जैसी हलचल वास्तव में ग्लेशियर, चट्टान और बर्फ के बड़े हिस्से के ढहने से पैदा हुई थी।

वैज्ञानिक अभी इस बात का अध्ययन कर रहे हैं कि पहाड़ी ढलान किस क्रम में अस्थिर हुई और घटना इतनी तेजी से कैसे आगे बढ़ी।

दार्जिलिंग के लिए क्यों अहम है नेपाल की घटना?

नेपाल में हुई इस घटना का सीधा असर दार्जिलिंग में होना जरूरी नहीं है, लेकिन विशेषज्ञ इसे चेतावनी के तौर पर देख रहे हैं। दार्जिलिंग भी उसी भूगर्भीय रूप से सक्रिय हिमालयी क्षेत्र का हिस्सा है।

यहां ऊंची और खड़ी पहाड़ियां, मानसून के दौरान भारी बारिश और भूस्खलन की आशंका पहले से मौजूद रहती है। इसके अलावा दार्जिलिंग भूकंपीय रूप से भी संवेदनशील क्षेत्र में आता है।

ऊपरी हिमालय से आने वाली नदियां भी निचले इलाकों पर असर डाल सकती हैं। ऐसे में किसी बड़े भूकंप या अत्यधिक बारिश की स्थिति में एक साथ कई तरह की प्राकृतिक आपदाओं का खतरा बढ़ सकता है।

दार्जिलिंग में पहले भी दिख चुका है भारी बारिश का असर

दार्जिलिंग में पिछले वर्षों में भारी बारिश के कारण भूस्खलन और मलबे के बहाव की घटनाएं सामने आती रही हैं। अक्टूबर 2025 में जिले के कुछ इलाकों में करीब 12 घंटे के भीतर 300 मिलीमीटर से ज्यादा बारिश दर्ज की गई थी।

इस भारी बारिश के बाद कई जगहों पर भूस्खलन और मलबे के बहाव की घटनाएं हुई थीं। इससे साफ है कि पहाड़ी इलाकों में कम समय में होने वाली अत्यधिक बारिश कितना बड़ा खतरा पैदा कर सकती है।

भूकंप के लिहाज से भी संवेदनशील है दार्जिलिंग

दार्जिलिंग सीस्मिक जोन IV में आता है। इसे भूकंप के लिहाज से उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में गिना जाता है। जिले की आपदा प्रबंधन योजना में भी भूकंप और भूस्खलन को प्रमुख प्राकृतिक खतरों में शामिल किया गया है।

ऐसे में अगर किसी बड़े भूकंप के कारण पहाड़ी ढलान अस्थिर होती है तो खतरा सिर्फ जमीन के हिलने तक सीमित नहीं रहेगा। चट्टानों के गिरने, भूस्खलन होने और नदी के रास्ते में मलबा जमा होने जैसी घटनाएं भी हो सकती हैं।

नदी का रास्ता अचानक बंद होने के बाद पानी जमा हो सकता है और बाद में बांध जैसी बनी यह प्राकृतिक रुकावट टूटने पर अचानक बाढ़ की स्थिति पैदा हो सकती है।

बंगाल और सिक्किम के लिए भी GLOF की चिंता

ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF का खतरा पूर्वी हिमालय के लिए नया नहीं है। सिक्किम में अक्टूबर 2023 में दक्षिण ल्होनक झील के फटने की घटना इसका बड़ा उदाहरण रही है।

ग्लेशियल झील से निकली पानी की तेज लहर ने तीस्ता नदी तंत्र को प्रभावित किया था और बड़े पैमाने पर नुकसान हुआ था। इस तरह की घटनाओं ने हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियल झीलों की निगरानी और आपदा पूर्व चेतावनी प्रणाली की जरूरत को और महत्वपूर्ण बना दिया है।

विभिन्न मॉडलिंग अध्ययनों में यह भी संकेत दिया गया है कि संभावित GLOF की स्थिति में हजारों लोग, बड़ी संख्या में बस्तियां, पुल और हाइड्रोपावर परियोजनाएं प्रभावित हो सकती हैं।

बदलते मौसम के बीच बढ़ रही चुनौती

विशेषज्ञों के मुताबिक, हिमालय में बढ़ते तापमान, ग्लेशियरों में बदलाव, भारी बारिश और कमजोर होती पहाड़ी ढलानों के कारण भविष्य में ऐसी घटनाओं का जोखिम और गंभीर हो सकता है।

नेपाल की मौजूदा त्रासदी सिर्फ एक देश की प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि पूरे पूर्वी हिमालय के लिए एक चेतावनी के रूप में देखी जा रही है। दार्जिलिंग, सिक्किम और आसपास के पहाड़ी क्षेत्रों में भूस्खलन, अचानक बाढ़ और GLOF जैसे खतरों की लगातार निगरानी करना अब पहले से ज्यादा जरूरी हो गया है।

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