विश्व कठपुतली दिवस : लकड़ी और रंग-बिरंगे कपड़ों से मनोरंजन, भारतीय संस्कृति का भी प्रतिबिंब
नई दिल्ली, 20 मार्च (आईएएनएस)। आज के समय में मोबाइल, ओटीटी प्लेटफॉर्म्स और ऑनलाइन गेम्स ने मनोरंजन के नए द्वार खोल दिए हैं, मगर एक समय था, जब इन सबके बिना भी लोग हंसते-खेलते थे। वह साधन थी रंग-बिरंगी छोटी-छोटी कठपुतलियां। लकड़ी से तराशी गई, रंग-बिरंगे जरीदार कपड़ों से सजी कठपुतलियां मंच पर जीवंत हो उठती थीं। कलाकार धागों या छड़ों से इन्हें नचाते, लोककथाएं, प्रेम प्रसंग और व्यंग्यपूर्ण कहानियां सुनाते। ये न सिर्फ मनोरंजन करती हैं, बल्कि नैतिक मूल्य, हास्य और सामाजिक संदेश भी देती थीं।
कलाकारों की हाजिरजवाबी, लयबद्ध संवाद और चंचल अंदाज इस कला को खास बना देते हैं। बच्चे तो बच्चे बड़ों को भी यह भाता। कठपुतली कला का इतिहास बहुत पुराना है।
जानकारी के अनुसार, सबसे पहले इसका पहला उल्लेख महाभारत में मिलता है। वहीं, पाणिनी की अष्टाध्यायी में नटसूत्र के माध्यम से इसका जिक्र मिलता है। एक पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान शिव ने लकड़ी की मूर्ति में प्रवेश कर माता पार्वती का मन बहलाया था, जिससे इस कला की शुरुआत हुई।
सिंहासन बत्तीसी में भी विक्रमादित्य के सिंहासन की 32 कठपुतलियों का वर्णन है। यह कई कलाओं का संगम है, जिसमें नाटक, चित्रकला, मूर्तिकला, वस्त्र सज्जा, संगीत और नृत्य शामिल है।
खास बात है कि अंतरराष्ट्रीय कठपुतली संघ ने साल 2003 से इसे वैश्विक स्तर पर मान्यता दी। आज की जरूरत है कि कठपुतली कला में तकनीकी और पूंजी का निवेश हो। आधुनिकीकरण से प्रदर्शन बेहतर हो सकते हैं। कलाकारों को समाज और सरकार से समर्थन मिले, ताकि यह विरासत बनी रहे।
भारत में कठपुतली की कई शैलियां प्रचलित हैं। धागा कठपुतली में जोड़ों वाले अंगों को धागों से नियंत्रित किया जाता है। छाया कठपुतली में पर्दे के पीछे से रोशनी डालकर छाया दिखाई जाती है। दस्ताना या हथेली कठपुतली हाथ में पहनकर की जाती है, जबकि छड़ कठपुतली बड़ी होती है और छड़ों से संचालित होती है।
राजस्थान में पोशाक वाली कठपुतलियां योद्धाओं या राजा-रानी के किस्से सुनाती हैं, जिसमें युद्ध, नृत्य और रोमांच होता है। ये कठपुतलियां स्थानीय वेशभूषा, वास्तुकला और चित्रकला का प्रतिबिंब भी दिखाती हैं।
कठपुतली कला सदियों से मनोरंजन का साधन रही है। पुराने समय में गांवों में कलाकार घूम-घूमकर लोगों का मनोरंजन करते थे। आधुनिक युग में टीवी, फिल्में, वेब सीरीज, मोबाइल गेम्स और सोशल मीडिया ने इस कला को पीछे धकेल दिया है। आज के समय के बच्चे तो शायद ही कठपुतलियों के बारे में जानते हों।
ऐसे में आश्चर्य नहीं कि कठपुतली कला हाशिए पर चली गई है। इस खूबसूरत कला को याद रखने और फिर से जीवंत करने की कोशिश में हर साल 21 मार्च को विश्व कठपुतली दिवस मनाया जाता है। इस दिवस का मकसद कठपुतली कला को फिर से जीवंत करना, कलाकारों को सम्मान देना और नई पीढ़ी में रुचि जगाना है।
--आईएएनएस
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