विश्व पटल पर भारतीय सिनेमा को सत्यजित राय ने दिलाई थी पहचान, अपनी फिल्मों में आम लोगों को करते थे कास्ट
नई दिल्ली, 22 अप्रैल (आईएएनएस)। भारतीय सिनेमा के सबसे महान निर्देशकों में शुमार सत्यजित राय (सत्यजीत रे) की कहानियां और फिल्में सादगी, मानवीय संवेदनाओं और बारीकियों के लिए पूरी दुनिया में जानी जाती हैं। सत्यजित राय न केवल भारत के बल्कि विश्व सिनेमा के सबसे प्रभावशाली फिल्मकारों में से एक थे। उनका जन्म 2 मई 1921 को कलकत्ता (अब कोलकाता) के एक समृद्ध कलात्मक और साहित्यिक परिवार में हुआ था। राय की मृत्यु 23 अप्रैल 1992 को हुई थी।
भारत रत्न से सम्मानित सत्यजित राय की फिल्मों में कोई बनावटीपन नहीं होता था। वे जीवन को वैसा ही दिखाते थे जैसा वह है। उनकी प्रसिद्ध अपु त्रयी, पाथेर पांचाली, अपराजितो और अपुर संसार, इसका सबसे बेहतरीन उदाहरण है। उन्होंने पेशेवर कलाकारों के बजाय अक्सर आम लोगों को कास्ट किया ताकि फिल्म वास्तविक लगे।
सत्यजित राय केवल निर्देशक नहीं थे बल्कि एक कुशल लेखक, संगीतकार, चित्रकार और ग्राफिक डिजाइनर भी थे। अपनी अधिकांश फिल्मों का संगीत वे खुद तैयार करते थे। उन्होंने बच्चों और किशोरों के लिए 'फेलुदा' (जासूस) और 'प्रोफेसर शोंकू' (वैज्ञानिक) जैसे यादगार पात्रों की रचना की। राय का मानना था कि सिनेमा एक दृश्य माध्यम है। वे कम संवादों और बेहतरीन कैमरा वर्क के जरिए गहरी भावनाएं व्यक्त करने में माहिर थे। उनकी फिल्म 'चारुलता' को निर्देशन की दृष्टि से उनकी सबसे उत्कृष्ट कृतियों में से एक माना जाता है, जहां अकेलेपन को दृश्यों के माध्यम से बखूबी दर्शाया गया है। राय की फिल्मों की कहानियां अक्सर प्रसिद्ध साहित्य पर आधारित होती थीं, लेकिन वे उन्हें पर्दे पर उतारते समय अपनी एक मौलिक दृष्टि जोड़ देते थे।
सत्यजित राय पहले भारतीय थे जिन्हें सिनेमा में उनके आजीवन योगदान के लिए मानद ऑस्कर से सम्मानित किया गया था। उनकी फिल्में आज भी दुनिया भर के फिल्म निर्माताओं के लिए एक पाठशाला की तरह हैं। राय के फिल्मों की कहानियां केवल बंगाल या भारत की नहीं थीं, बल्कि वे सार्वभौमिक थीं, जो हर इंसान के दिल को छूती थीं।
सत्यजित राय के पिता सुकुमार राय और दादा उपेंद्रकिशोर राय चौधरी प्रसिद्ध लेखक और कलाकार थे। राय ने कलकत्ता के प्रेसीडेंसी कॉलेज से अर्थशास्त्र की पढ़ाई की, लेकिन उनकी रुचि हमेशा ललित कलाओं में रही। बाद में उन्होंने शांतिनिकेतन में रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा स्थापित 'विश्व भारती' विश्वविद्यालय में कला की शिक्षा ली।
फिल्मों में आने से पहले राय ने एक विज्ञापन एजेंसी 'डी.जे. कीमर' में विजुअलाइज़र और ग्राफिक डिजाइनर के रूप में काम किया। उन्होंने कई प्रसिद्ध किताबों के कवर डिजाइन किए, जिनमें बिभूतिभूषण बंद्योपाध्याय की पाथेर पांचाली भी शामिल थी। इसी दौरान उनमें फिल्म निर्माण की इच्छा जागी। 1950 में लंदन यात्रा के दौरान उन्होंने इतालवी फिल्म बाइसिकल थीव्स देखी, जिसने उन्हें यथार्थवादी सिनेमा बनाने के लिए प्रेरित किया।
भारी आर्थिक कठिनाइयों के बीच उन्होंने अपनी पहली फिल्म पाथेर पांचाली (1955) बनाई। इस फिल्म ने भारतीय सिनेमा को वैश्विक पहचान दिलाई और कान्स फिल्म फेस्टिवल में 'बेस्ट ह्यूमन डॉक्यूमेंट' का पुरस्कार जीता। सत्यजित राय ने अपने करियर में 36 फिल्में निर्देशित कीं, जिनमें फीचर फिल्में, वृत्तचित्र और लघु फिल्में शामिल थीं। जलसाघर, देवी, चारुलता, शतरंज के खिलाड़ी (उनकी पहली हिंदी फिल्म) और नायक थीं। उन्होंने 'संदेश' पत्रिका का संपादन भी किया।
राय को उनके जीवनकाल में अनगिनत राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार मिले थे। 1992 में भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया था। 1992 में सिनेमाई कौशल के लिए मानद ऑस्कर, 1984 में दादा साहब फाल्के पुरस्कार और फ्रांस का सर्वोच्च सम्मान लीजन ऑफ ऑनर मिल चुका था।
1983 में फिल्म घरे बाइरे पर काम करते हुए राय को दिल का दौरा पड़ा, जिससे उनके जीवन के बाकी 9 सालों में उनकी कार्य-क्षमता बहुत कम हो गई। घरे बाइरे का छायांकन राय के बेटे की मदद से 1984 में पूरा हुआ। 1992 में राय का स्वास्थ्य बहुत बिगड़ गया, जिससे वह कभी उबर नहीं पाए। मृत्यु से कुछ ही हफ्ते पहले उन्हें सम्मानजनक अकादमी पुरस्कार दिया गया। 23 अप्रैल 1992 को उनका देहान्त हो गया था।
--आईएएनएस
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