विश्व अंग दान दिवस : 'जिंदगी के सफर में' विराम से भी संभव जीवनदान...
नई दिल्ली, 12 अगस्त (आईएएनएस)। सांसें थम जाने के बाद भी अगर किसी इंसान के अंग किसी जरूरतमंद के शरीर में मौजूद रहें, तो यह इंसानियत की एक बड़ी मिसाल है। अगर कोई अंग दान करता है, तो यह कई परिवारों को मुस्कुराने का मौका दे सकता है।
इसी संदेश के साथ हर साल 13 अगस्त को 'विश्व अंगदान दिवस' के रूप में मनाया जाता है। इस दिन को मनाने का मकसद अंगदान के प्रति जागरूकता बढ़ाने के साथ-साथ उन तमाम मिथकों और गलतफहमियों को दूर करना भी है, जो किसी जरूरतमंद तक जीवन पहुंचने की राह में बाधा बनते हैं।
अंगदान वह प्रक्रिया है, जिसमें किसी व्यक्ति की सहमति और निर्धारित कानूनी-चिकित्सकीय प्रक्रिया के तहत उसके स्वस्थ अंग या ऊतक किसी ऐसे मरीज को प्रत्यारोपित किए जाते हैं, जिसका संबंधित अंग काम नहीं कर रहा हो। परिस्थितियों के अनुसार जीवित व्यक्ति भी कुछ अंगों या अंग के हिस्से का दान कर सकता है, जबकि मृत्यु के बाद भी उपयुक्त अंगों और ऊतकों का दान संभव है। गुर्दा, हृदय, फेफड़े, आंखों समेत कई अंग गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीजों को नया जीवन दे सकते हैं।
कुछ परिस्थितियों में एक दाता से प्राप्त अंगों और ऊतकों से कई लोगों की जिंदगी बचाने या उनके जीवन की गुणवत्ता बेहतर करने में मदद मिल सकती है। अक्सर कहा जाता है कि एक अंगदाता आठ लोगों तक की जान बचाने में योगदान दे सकता है, हालांकि वास्तविक संख्या दाता की चिकित्सकीय स्थिति और उपलब्ध अंगों पर निर्भर करती है।
किडनी, लिवर, हृदय, फेफड़े जैसे महत्वपूर्ण अंगों के खराब हो जाने पर कई मरीजों के सामने प्रत्यारोपण ही जीवन बचाने का विकल्प रह जाता है। समस्या यह है कि जरूरतमंद मरीजों की संख्या और उपलब्ध अंगों के बीच बड़ा अंतर है। यही वजह है कि अंगदान के लिए स्वैच्छिक रूप से आगे आना बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। केवल इच्छा जताना ही नहीं, बल्कि अपने परिवार को भी अपनी इच्छा के बारे में बताना जरूरी है, ताकि जरूरत पड़ने पर परिवार उस निर्णय को समझ सके और उसका सम्मान कर सके।
भारत में सरकार और स्वास्थ्य संस्थाओं की ओर से अंगदान को बढ़ावा देने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। राष्ट्रीय अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण संगठन देश में अंग और ऊतक दान तथा प्रत्यारोपण की व्यवस्था को समन्वित करने वाली महत्वपूर्ण संस्था है।
अंगदान के संदर्भ में सड़क दुर्घटनाओं और गंभीर मस्तिष्क चोटों का भी विशेष महत्व है, क्योंकि कुछ मामलों में ब्रेनडेड के बाद व्यक्ति के स्वस्थ अंगों का दान संभव हो सकता है। ब्रेनडेड की स्थिति में चिकित्सकीय और कानूनी मानकों के अनुसार अंगदान की संभावना पैदा हो सकती है। यही वह क्षेत्र है, जहां जागरूकता, प्रशिक्षित चिकित्सा व्यवस्था और परिवार की सहमति महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
अंग प्रत्यारोपण का इतिहास इंसानी संवेदना और चिकित्सा विज्ञान के अद्भुत मेल की कहानी भी है। रोनाल्ड ली हेरिक ने वर्ष 1954 में अपने जुड़वां भाई रिचर्ड हेरिक को एक किडनी दान की थी। इस ऐतिहासिक प्रत्यारोपण को डॉक्टर जोसेफ मरे और उनकी टीम ने अंजाम दिया। यह सफल जीवित-दाता किडनी प्रत्यारोपण चिकित्सा इतिहास में मील का पत्थर बना। बाद में डॉ. जोसेफ मरे को अंग और कोशिका प्रत्यारोपण से संबंधित उनके महत्वपूर्ण योगदान के लिए 1990 में शरीर क्रिया विज्ञान या चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया।
13 अगस्त को विश्व स्तर पर अंगदान के प्रति जागरूकता से जुड़ा दिवस मनाया जाता है। भारत ने अंगदान और प्रत्यारोपण के लिए कानूनी और संस्थागत व्यवस्था भी विकसित की है। अंगदान को लेकर सबसे बड़ी गलतफहमियों में से एक यह है कि इसके लिए केवल युवा और पूरी तरह स्वस्थ व्यक्ति ही पात्र होते हैं। वास्तविकता यह है कि अंगदान की उपयुक्तता व्यक्ति की उम्र से ज्यादा उसकी चिकित्सकीय स्थिति और संबंधित अंग की स्थिति पर निर्भर करती है। जीवित व्यक्ति कुछ परिस्थितियों में एक किडनी या लिवर के एक हिस्से का दान कर सकता है। मृत्यु के बाद भी उपयुक्त अंगों और ऊतकों का दान संभव हो सकता है। 18 वर्ष से कम उम्र के संभावित दाताओं के मामले में पंजीकरण और दान से जुड़े निर्णयों के लिए माता-पिता या कानूनी अभिभावक की सहमति आवश्यक होती है।
अंगदान का संकल्प लेना महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे भी जरूरी है कि व्यक्ति अपनी इच्छा के बारे में अपने परिवार को बताए। मृत्यु के बाद अंगदान की प्रक्रिया में परिवार की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। ऐसे में परिवार अगर पहले से व्यक्ति की इच्छा से परिचित हो, तो कठिन समय में निर्णय लेना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है।
अंगदान को लेकर समाज में कई तरह की गलत धारणाएं मौजूद हैं, उम्र को लेकर भ्रम, बीमारी को लेकर डर, धार्मिक मान्यताओं को लेकर आशंका या यह सोच कि अंगदान के बाद शरीर का सम्मान नहीं किया जाएगा। चिकित्सा विज्ञान में हुई प्रगति ने इनमें से कई भ्रांतियों को चुनौती दी है। किसी व्यक्ति के अंगदान की उपयुक्तता का निर्णय चिकित्सकीय विशेषज्ञ संबंधित परिस्थितियों और अंगों की स्थिति के आधार पर करते हैं। इसलिए केवल किसी बीमारी, उम्र या पूर्व स्वास्थ्य समस्या के आधार पर खुद को संभावित दाता मानने से इनकार कर देना उचित नहीं है।
भारत में प्रत्यारोपण की संख्या बढ़ रही है, लेकिन जरूरत और उपलब्धता के बीच अंतर अब भी बड़ी चुनौती है। हाल के वर्षों में देश में प्रत्यारोपण सुविधाओं और बुनियादी ढांचे में विस्तार हुआ है, फिर भी मृतक-दाता अंगदान की दर को और बढ़ाने की जरूरत बनी हुई है। इसके लिए लोगों को सिर्फ अंगदान के लिए प्रेरित करना पर्याप्त नहीं है। उन्हें सही जानकारी देना भी उतना ही जरूरी है।
अंगदान का फैसला व्यक्तिगत है, लेकिन उसका प्रभाव सामाजिक और मानवीय होता है। जागरूकता, वैज्ञानिक सोच और परिवार से संवाद के जरिए प्रतीक्षा सूची में जिंदगी की उम्मीद लगाए बैठे अनेक मरीजों तक मदद पहुंचाई जा सकती है।
--आईएएनएस
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