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'विरासत के बिना विकास अधूरा, जड़ों के बिना वृक्ष भी नहीं फलता-फूलता है', स्वर्णिका संवाद में बोलीं डॉ. सोनल मानसिंह

'विरासत के बिना विकास अधूरा, जड़ों के बिना वृक्ष भी नहीं फलता-फूलता है', स्वर्णिका संवाद में बोलीं डॉ. सोनल मानसिंह
'विरासत के बिना विकास अधूरा, जड़ों के बिना वृक्ष भी नहीं फलता-फूलता है', स्वर्णिका संवाद में बोलीं डॉ. सोनल मानसिंह

नई दिल्ली, 24 अक्टूबर (आईएएनएस)। सेंटर फॉर क्लासिकल डांसेज के मंच पर शनिवार को भारतीय शास्त्रीय नृत्य, कला और संस्कृति की रचनात्मक अर्थव्यवस्था पर केंद्रित 'स्वर्णिका संवाद' का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में बीजद सांसद डॉ. सस्मित पात्रा ने इसे देश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को मजबूती देने वाला स्वर्णिम अध्याय बताया, वहीं पद्म विभूषण डॉ. सोनल मानसिंह ने कहा कि अव्यवस्था के दौर में संस्कृति ही वह केंद्रीय बिंदु है जो जीवन और विकास को स्थिर रख सकती है। उन्होंने कहा कि विकसित भारत का लक्ष्य विरासत के बिना पूरा नहीं हो सकता और अब इस संवाद को टियर-2 व टियर-3 शहरों तक ले जाया जाएगा।

बीजद सांसद सस्मित पात्रा ने कहा, "डॉ. सोनल मानसिंह ने स्वर्णिका संवाद आयोजित किया है। यह हमारे देश की धरोहर, हमारी परंपरा और उसकी जो समृद्ध सांस्कृतिक विरासत है, उसे प्रतिपादित करता है। मैं ओडिशा से आता हूं और डॉ. सोनल मानसिंह, ओडिसी की एक प्रमुख प्रतिनिधि के रूप में पूरे विश्व में ख्याति-संपन्न हैं। ओडिशा में विशेषकर उनकी एक प्रतिष्ठा और विशिष्ट सम्मान है।"

उन्होंने कहा कि स्वर्णिका संवाद के माध्यम से आज पूरे दिन जो चर्चाएं होंगी, उनमें हमारे देश की संस्कृति, कला और विभिन्न सांस्कृतिक स्वरूपों (आर्ट एंड कल्चर फॉर्म्स) को और अधिक मजबूती के साथ आगे कैसे ले जाया जा सकता है, उन तमाम पहलुओं पर गौर किया जाएगा। कई पैनल डिस्कशन हैं और उनमें अनेक महत्वपूर्ण बिंदुओं को उजागर किया जाएगा, जिनके माध्यम से आने वाले दिनों में जो नीतियां बनेंगी और कार्यों को और बेहतर तरीके से संपन्न करने का जो प्रयास होगा, उस पर चर्चा होगी।

बीजद सांसद ने कहा कि मेरा पूर्ण विश्वास है कि डॉ. सोनल मानसिंह द्वारा जो यह सोच और प्रयास किया जा रहा है, यह हमारी सांस्कृतिक विरासत, संस्कृति और सभ्यता को और मजबूत करने की दिशा में कारगर सिद्ध होगा। निश्चित रूप से यह एक स्वर्णिम अध्याय की शुरुआत है, जिसमें हम आने वाले दिनों में अपनी कला और संस्कृति को और अधिक मजबूती के साथ आगे ले जाएंगे। उस दिशा में जो पहल की जा रही है, उसकी मैं सराहना करता हूं।

डॉ. सोनल मानसिंह ने कहा, "विषय बहुत व्यापक है। बहुत सारे संयोगों का परिवर्तन हो रहा है और नई-नई पीढ़ियां आ रही हैं। विश्व भर में एक प्रकार की अव्यवस्था छाई हुई है। इन सबके बीच एक केंद्रीय बिंदु, जो जीवन, विचारों और ऊर्जा को स्थिर रख सके और विकास को आगे बढ़ा सके, वह यदि एकमात्र है तो संस्कृति है, क्योंकि संस्कृति हजारों वर्षों से अविरल चली आ रही है। अर्थव्यवस्थाएं बदलती रहती हैं। वैश्विक होती हैं, सामाजिक होती हैं, देश के लिए होती हैं। इन सबके बीच आज विचार यह है, जो पहले शायद इस रूप में नहीं सोचा गया था कि किस प्रकार रचनात्मकता को अंतःप्रेरणा और कल्पनाशक्ति के माध्यम से विकसित किया जाए।"

उन्होंने कहा कि आप उन्हीं चीजों को एक अलग परिप्रेक्ष्य से देखें, उन पर अलग विचार व्यक्त करें और अलग कार्य करें। यही रचनात्मकता है, लेकिन संस्कृति के बिना यह संभव नहीं है। एक पेड़ को आप भी देख रहे हैं, मैं भी देख रही हूं और अन्य लोग भी देख रहे हैं। पेड़ को काटकर कागज बनाया जा सकता है, रास्ता चौड़ा किया जा सकता है, या उसे जलाकर भोजन पकाया जा सकता है। ऐसे विचार भी आते हैं, लेकिन कलाकार का दृष्टिकोण कुछ और होता है। इस प्रकार एक अलग नजरिया विकसित करना आज आवश्यक हो गया है।

डॉ. सोनल मानसिंह ने कहा कि हम लोग, जिन्हें परफॉर्मिंग आर्टिस्ट कहा जाता है, नृत्य करते हैं, संगीतकार गाते हैं, वाद्य बजाते हैं, लेखक लिखते हैं, चित्रकार चित्र बनाते हैं। हम सबका योगदान क्या है, सरकार की भूमिका क्या है, और नीति-निर्माण में क्या सोचा जाना चाहिए, यह भी महत्वपूर्ण है। मैं देख रही हूं कि प्रदर्शन स्थलों का ढांचा समाप्त होता जा रहा है। पहले कम्युनिटी सेंटर्स हुआ करते थे। मुझे याद है कि हमने लाजपत नगर, डिफेंस कॉलोनी, गीता कॉलोनी, और शाहदरा के कम्युनिटी सेंटर्स में अनेक प्रस्तुतियां दी थीं।

उन्होंने कहा कि वहां नृत्य-संगीत की कक्षाएं होती थीं, प्रस्तुतियां होती थीं, और चर्चाएं भी होती थीं। अब वे लगभग समाप्त हो गए हैं। जैसा सस्मित पात्रा ने कहा, "एआई आ गया है।" उससे पहले मोबाइल फोन आए। आज स्थिति यह है कि लोग साइकिल चलाते हुए भी एक हाथ से हैंडल पकड़े रहते हैं और दूसरे हाथ में मोबाइल रखते हैं। पिछले 25-30 वर्षों में जो ये परिवर्तन हुए हैं, उनसे नई और अलग परिस्थितियां पैदा हुई हैं।

डॉ. सिंह ने कहा कि यह संवाद केवल नृत्य, केवल संगीत, केवल टेक्सटाइल, केवल हस्तशिल्प या केवल सिनेमा तक सीमित नहीं है। यह समग्रता में सोचने का प्रयास है। इसी उद्देश्य से यह संवाद आयोजित किया गया है। उस सोच को आगे बढ़ाने वाले अनेक लोगों को हमने बुलाया है। आपने सुबह सुना होगा कि बांसुरी स्वराज ने बहुत मुखर होकर अपनी बात रखी। सस्मित पात्रा ने भी बहुत अच्छे प्रश्न उठाए।

उन्होंने कहा कि प्रश्न नहीं उठाए जाएंगे तो उत्तर भी नहीं मिलेंगे। लोगों को सोचने पर मजबूर करना होगा कि क्या यह केवल पैसे की बात है, या इससे कहीं अधिक कुछ है। क्या कलाकार का काम केवल नाचना और गाना है, या उसके योगदान को समझकर उसे आगे बढ़ाना भी आवश्यक है? सभी के मन में विश्वास और आदर पैदा करना है। जो हजारों वर्षों से होता आया है, आज उसकी स्थिति क्या है, और आज से आगे हमें कहां जाना है, यह विचार करना होगा।

डॉ. मानसिंह ने आगे कहा कि फिर वही बात आती है, विकसित भारत। लेकिन विकास भी और विरासत भी। विरासत के बिना, जड़ों के बिना वृक्ष न तो फलता है और न ही फूलता है। इसलिए इन बातों को बार-बार दोहराना चाहिए। यह एक शुरुआत है और हम इसे चार-पांच अन्य बड़े शहरों में ले जाने की योजना बना रहे हैं। उसके बाद टियर-2 और टियर-3 शहरों में भी इस पर कार्य करेंगे। हम लोगों को सोचने पर मजबूर करेंगे, और सरकारों को भी सोचने पर मजबूर करेंगे।

उन्होंने कहा कि जैसा कहा गया कि सीएसआर (कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी) बहुत बड़ा क्षेत्र है, लेकिन उसमें संस्कृति के लिए बहुत कम समर्थन है। स्वास्थ्य और शिक्षा है, लेकिन यदि शिक्षा से संस्कृति को हटा दिया जाए तो उसका सार ही समाप्त हो जाता है। शिक्षा का मक्खन तो संस्कृति है, इसलिए इसे फिर से एकीकृत (इंटीग्रेट) करने की पहल होनी चाहिए। हमारे भारत का प्राण यही है। तो सोचिए, विचार कीजिए, बोलिए, संवाद कीजिए। संवाद से ही विचार आगे बढ़ते हैं।

--आईएएनएस

केके/डीकेपी

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