सोशल मीडिया पर वायरल! बुढ़ापे में अपनी माँ को अकेले छोड़ने वाली औलादें कितनी बेरहम होती होंगी
बुढ़ापा हर इंसान के जीवन का वह दौर है, जब शरीर कमजोर हो जाता है और इंसान मानसिक और शारीरिक रूप से सहारा चाहता है। यह समय माता‑पिता के लिए सबसे संवेदनशील होता है, और यही वह समय है जब बच्चों की जिम्मेदारी सबसे अधिक होती है। लेकिन दुर्भाग्य से कई बार देखा जाता है कि बुढ़ापे में अपनी माँ को अकेले छोड़ देने वाली औलादें कितनी बेरहम होती हैं।
माता‑पिता ने जीवन भर बच्चों की परवरिश की, उन्हें पढ़ाया‑लिखाया, हर जरूरत पूरी की और हर कठिन समय में उनकी सुरक्षा का भरोसा दिया। लेकिन कई बुजुर्ग अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में तनहा और असुरक्षित महसूस करते हैं, क्योंकि उनके अपने बच्चे उन्हें छोड़ देते हैं। अकेलेपन का दर्द, रोग‑बाधाओं की चिंता और सुरक्षा की कमी बुढ़ापे को और कठिन बना देती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अकेलेपन और बच्चों की बेरहमी बुजुर्गों के मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डालती है। अवसाद, चिंता और हृदय रोग जैसी बीमारियाँ बुजुर्गों में तेजी से बढ़ती हैं। जो परिवार प्रेम और देखभाल प्रदान नहीं कर पाता, वहाँ बुजुर्ग अपने जीवन की आखिरी यात्रा में न केवल शारीरिक बल्कि मानसिक दर्द भी झेलते हैं।
समाज में यह भी देखा गया है कि असुरक्षित बुजुर्गों की संख्या लगातार बढ़ रही है। वृद्धाश्रमों और वरिष्ठ नागरिकों के लिए बनाए गए संस्थानों में बहुत से माता‑पिता अपने बच्चों द्वारा छोड़ दिए जाने के कारण पहुँचते हैं। इसका असर केवल बुजुर्गों पर ही नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना और नैतिक मूल्यों पर भी पड़ता है।
ऐसे में जरूरी है कि समाज में सद्भावना, सम्मान और पारिवारिक जिम्मेदारी के महत्व को दोबारा समझाया जाए। बच्चों को यह याद दिलाना चाहिए कि माता‑पिता के प्रति कर्तव्य केवल एक नैतिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि मानवता का एक मूलभूत मूल्य है। बुढ़ापे में माता‑पिता की देखभाल करना, उनका सम्मान करना और अकेलापन कम करना ही सही इंसानियत की पहचान है।
इसके अलावा, सरकार और सामाजिक संगठन भी बुजुर्गों के लिए सुरक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर बनाने में भूमिका निभा सकते हैं। स्वास्थ्य सुविधाओं, वित्तीय सहायता और सामाजिक समर्थन से बुजुर्गों को अकेलेपन का सामना करने में मदद मिल सकती है।
अंततः सवाल यही है कि बुढ़ापे में अपनी माँ को अकेले छोड़ देने वाली औलादें कितनी बेरहम होती हैं। यह केवल व्यक्तिगत प्रश्न नहीं, बल्कि समाज की संवेदनशीलता और नैतिक मूल्यों का आईना है। बच्चों को यह समझना होगा कि माता‑पिता का सम्मान और देखभाल जीवन का सबसे बड़ा कर्तव्य है।

