विदेशों तक गूंजी उस्ताद जिया फरीदुद्दीन डागर की आवाज, ऑस्ट्रिया में सिखाया 'ध्रुपद' का असली सुर
मुंबई, 7 मई (आईएएनएस)। उस्ताद जिया फरीदुद्दीन डागर ने अपनी पूरी जिंदगी शास्त्रीय गायन शैली 'ध्रुपद' को समर्पित कर दी। आज जब ध्रुपद को दुनिया भर में सम्मान की नजर से देखा जाता है, तो उसके पीछे डागर परिवार की कई पीढ़ियों की साधना रही है।
8 मई 2013 को जिया फरीदुद्दीन डागर ने दुनिया से अलविदा कह दिया। बहुत कम लोग जानते हैं कि उन्होंने ऑस्ट्रिया में लंबे समय तक रहकर ध्रुपद सिखाया था। उस समय विदेशों में ध्रुपद सीखना और सिखाना बेहद दुर्लभ माना जाता था, लेकिन उनकी आवाज और संगीत की गहराई ने यूरोप के लोगों को भी भारतीय संगीत की ओर खींच लिया।
उस्ताद जिया फरीदुद्दीन डागर का जन्म 15 जून 1932 को राजस्थान के उदयपुर में हुआ था। उनके पिता उस्ताद जियाउद्दीन डागर उदयपुर के महाराणा भूपाल सिंह के दरबारी संगीतकार थे। घर का माहौल पूरी तरह संगीत से भरा था। बचपन से ही उन्हें ध्रुपद गायन और वीणा की शिक्षा मिलने लगी थी। कहा जाता है कि बहुत छोटी उम्र में ही उन्होंने सुरों की पहचान करना शुरू कर दिया था। पिता की देखरेख में उनकी संगीत शिक्षा शुरू हुई और धीरे-धीरे संगीत ही उनकी जिंदगी बन गया।
जब उनके पिता का निधन हुआ, तब उनके बड़े भाई उस्ताद जिया मोहिउद्दीन डागर ने उन्हें आगे की शिक्षा दी। दोनों भाइयों की जोड़ी बाद में ध्रुपद संगीत की दुनिया में सम्मान के साथ देखी जाने लगी।
जिया मोहिउद्दीन डागर रुद्र वीणा के महान कलाकार थे, जबकि जिया फरीदुद्दीन डागर अपनी गहरी आवाज के लिए पहचाने गए। दोनों ने मिलकर ध्रुपद को नई पहचान दिलाई। उस समय शास्त्रीय संगीत में ध्रुपद धीरे-धीरे कम होता जा रहा था, लेकिन डागर परिवार ने इसे जिंदा रखा। उन्होंने भारत के साथ-साथ विदेशों में भी कई बड़े मंचों पर प्रस्तुति दी। उनकी गायकी को सुनते-सुनते धीरे-धीरे यूरोप में भी लोग उनके संगीत के दीवाने हो गए।
साल 1980 के आसपास उन्होंने ऑस्ट्रिया में रहना शुरू किया और वहां ध्रुपद सिखाने लगे। वे फ्रांस और दूसरे यूरोपीय देशों में भी संगीत सिखाते थे। उस दौर में भारतीय शास्त्रीय संगीत के बहुत कम कलाकार विदेशों में जाकर ऐसी शैली की शिक्षा देते थे। कई विदेशी छात्र सिर्फ उनकी गायकी सुनने भारत आने लगे थे। उनके शिष्य उन्हें सिर्फ गुरु नहीं, बल्कि आध्यात्मिक मार्गदर्शक मानते थे।
बाद में फिल्म निर्देशक मणि कौल उनसे मिले और अपनी फिल्म के लिए संगीत देने की गुजारिश की। इसी दौरान उनका भोपाल आना-जाना बढ़ा। मध्य प्रदेश सरकार ने ध्रुपद को आगे बढ़ाने के लिए भोपाल में ध्रुपद केंद्र शुरू किया और उसकी जिम्मेदारी उस्ताद जिया फरीदुद्दीन डागर को दी गई। उन्होंने वहां करीब 25 साल तक छात्रों को संगीत सिखाया। गुंडेचा बंधु, उदय भावलकर और कई बड़े कलाकार उनके शिष्य रहे। उन्होंने ध्रुपद को सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि नई पीढ़ी तक पहुंचाया।
उनके योगदान के लिए उन्हें कई बड़े सम्मान मिले। उन्हें राजस्थान संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, तानसेन सम्मान, संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और टैगोर रत्न जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। संगीत की दुनिया में उनका नाम बेहद सम्मान के साथ लिया जाता है। 8 मई 2013 को उस्ताद जिया फरीदुद्दीन डागर का निधन हो गया। उन्होंने पनवेल के पास अपने गुरुकुल में अंतिम सांस ली।
--आईएएनएस
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