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वरिष्ठ पत्रकार डॉ. हरीश चंद्र बर्णवाल को 'मन की बात' पर शोध के लिए मिली डॉक्टरेट की उपाधि

नई दिल्ली, 15 फरवरी (आईएएनएस)। वरिष्ठ पत्रकार और प्रसिद्ध लेखक हरीश चंद्र बर्णवाल को उनके उत्कृष्ट शोध कार्य के लिए डॉक्टरेट (पीएचडी) की उपाधि से अलंकृत किया गया है। मानव रचना इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ रिसर्च एंड स्टडीज, फरीदाबाद (हरियाणा) के दीक्षांत समारोह में केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री द्वारा उन्हें यह मानद उपाधि प्रदान की गई।
वरिष्ठ पत्रकार डॉ. हरीश चंद्र बर्णवाल को 'मन की बात' पर शोध के लिए मिली डॉक्टरेट की उपाधि

नई दिल्ली, 15 फरवरी (आईएएनएस)। वरिष्ठ पत्रकार और प्रसिद्ध लेखक हरीश चंद्र बर्णवाल को उनके उत्कृष्ट शोध कार्य के लिए डॉक्टरेट (पीएचडी) की उपाधि से अलंकृत किया गया है। मानव रचना इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ रिसर्च एंड स्टडीज, फरीदाबाद (हरियाणा) के दीक्षांत समारोह में केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री द्वारा उन्हें यह मानद उपाधि प्रदान की गई।

डॉ. बर्णवाल ने अपना शोध प्रबंध प्रधानमंत्री के 'मन की बात' रेडियो कार्यक्रम का सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) के परिप्रेक्ष्य में विश्लेषण विषय पर प्रोफेसर डॉ. कुमार राजेश के मार्गदर्शन में पूर्ण किया है।

वैश्विक लक्ष्यों और जन-संवाद के लिए डॉ. बर्णवाल का यह शोध अकादमिक जगत में अपनी तरह का पहला ऐसा प्रयास है, जो संयुक्त राष्ट्र के 2030 तक निर्धारित 'सतत विकास लक्ष्यों' (एसडीजी) को भारत के सबसे लोकप्रिय रेडियो कार्यक्रम 'मन की बात' से जोड़कर देखता है।

शोध में यह स्थापित किया गया है कि कैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जटिल वैश्विक लक्ष्यों (जैसे गरीबी उन्मूलन, स्वास्थ्य, शिक्षा और महिला सशक्तिकरण) को सरकारी फाइलों से निकालकर आम आदमी की भाषा में एक 'जन-आंदोलन' बना दिया।

आंकड़ों और तथ्यों पर आधारित विश्लेषण, यह शोध प्रबंध पूरी तरह से सांख्यिकीय आंकड़ों और ठोस साक्ष्यों पर आधारित है। डॉ. बर्णवाल ने वर्ष 2014 से 2019 तक प्रसारित 'मन की बात' के सभी 53 एपिसोड्स का बारीकी से सांख्यिकीय (डेटा) विश्लेषण किया है।

शोध के निष्कर्षों के अनुसार स्वच्छता जैसे वैश्विक लक्ष्य पर सर्वाधिक 34 एपिसोड में चर्चा की गई। शिक्षा पर 28 एपिसोड, महिला सशक्तिकरण पर 27, स्वास्थ्य पर 25, पर्यावरण पर 21 और गरीबी उन्मूलन पर 16 एपिसोड में विस्तृत संवाद किया गया।

सामाजिक परिवर्तन और 'किस्सागोई' का प्रभाव - शोध में विशेष रूप से रेखांकित किया गया है कि प्रधानमंत्री की 'किस्सागोई' की कला ने कैसे लोगों के व्यवहार में परिवर्तन लाया। 'विकलांग' के स्थान पर 'दिव्यांग' शब्द काप्रयोग और, 'सेल्फी विद डॉटर' और 'परीक्षा पे चर्चा' जैसे अभियानों ने समाज की सोच में जो बदलाव लाया है, उसे इस शोध में वैज्ञानिक पद्धति से प्रमाणित किया गया है।

शोधार्थियों के लिए मार्गदर्शक दस्तावेज - मानव रचना संस्थान के अनुसार, यह शोध प्रबंध न केवल पत्रकारिता, बल्कि राजनीति विज्ञान और समाजशास्त्र के विद्यार्थियों के लिए एक प्रामाणिक संदर्भ ग्रंथ साबित होगा।

डॉ. हरीश चंद्र बर्णवाल का यह शोध प्रबंध निकट भविष्य में पुस्तक के रूप में भी उपलब्ध होगा, जो नीति-निर्माताओं और सामाजिक शोधार्थियों के लिए 'नए भारत' की विकास यात्रा को समझने का एक नया जरिया बनेगा।

इस अवसर पर संस्थान के फैकल्टी, गणमान्य अतिथि और अकादमिक जगत के विशेषज्ञों ने डॉ. बर्णवाल को इस राष्ट्रोपयोगी शोध के लिए बधाई दी।

--आईएएनएस

एमएस/

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