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वल्लियूरक्कवु भगवती मंदिर: आदिवासियों की आराध्य मां भगवती, नवरात्रि में तीन विशेष रूपों में होता है पूजन

नई दिल्ली, 5 मार्च (आईएएनएस)। देशभर में 19 मार्च से पावन पर्व नवरात्रि की शुरुआत होने जा रही है। इस दौरान श्रद्धालु नौ दिनों तक मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की पूजा-अर्चना करते हैं और उनसे सुख, समृद्धि व शांति की कामना करते हैं। भारत में मां भगवती के अनेक प्राचीन और प्रसिद्ध मंदिर स्थित हैं, जिनसे जुड़ी चमत्कारी कथाएं और आस्था की परंपराएं सदियों से लोगों के विश्वास को मजबूत करती आई हैं।
वल्लियूरक्कवु भगवती मंदिर: आदिवासियों की आराध्य मां भगवती, नवरात्रि में तीन विशेष रूपों में होता है पूजन

नई दिल्ली, 5 मार्च (आईएएनएस)। देशभर में 19 मार्च से पावन पर्व नवरात्रि की शुरुआत होने जा रही है। इस दौरान श्रद्धालु नौ दिनों तक मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की पूजा-अर्चना करते हैं और उनसे सुख, समृद्धि व शांति की कामना करते हैं। भारत में मां भगवती के अनेक प्राचीन और प्रसिद्ध मंदिर स्थित हैं, जिनसे जुड़ी चमत्कारी कथाएं और आस्था की परंपराएं सदियों से लोगों के विश्वास को मजबूत करती आई हैं।

ऐसे ही केरल के वायनाड में मां भगवती के तीन अद्भुत रूपों की पूजा होती है, जिन्हें प्रकृति से जोड़कर देखा गया है। हम बात कर रहे हैं वल्लियूरक्कवु भगवती मंदिर की।

हरी-भरी प्रकृति के मनमोहक दृश्यों के बीच वल्लियूरक्कवु भगवती मंदिर स्थापित है। दुनिया की पहुंच से दूर वल्लियूरक्कवु मंदिर में मां के तीन रूपों की पूजा होती है, जिसमें वन दुर्गा, भद्रकाली और जल दुर्गा मां शामिल हैं। वन दुर्गा और जल दुर्गा को प्रकृति का रूप माना जाता है, जबकि भद्रकाली को मां का सबसे उग्र रूप माना जाता है। खास बात यह है कि वल्लियूरक्कवु भगवती मंदिर वायनाड की आदिवासी जनजातियों का स्थानीय मंदिर है, जहां आज भी प्राचीन रीति-रिवाजों के साथ मां के तीनों रूपों की पूजा होती है।

मंदिर के बनाव एतिहासिक पृष्ठभूमि के साथ नहीं आता है। मंदिर का निर्माण पुराने झोपड़ीनुमा तरीके से किया गया है, जिस पर लकड़ी और फूस का इस्तेमाल किया गया है। माना जाता है कि मंदिर थिरुनेल्ली मंदिर के चार संरक्षक मंदिरों में से एक है और इसका निर्माण 14वीं शताब्दी में किया गया था।

मंदिर में चैत्र और शारदीय नवरात्रि के दौरान 14 दिन का लंबा अनुष्ठान चलता है जिसमें कलामेझुथु, ईडम कोरुम और सोपान नृत्यम किया जाता है। कलामेझुथु एक तरह की कला है, जो फर्श पर की जाती है। इसे धन और सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है, जबकि ईडम कोरुम और सोपान नृत्यम एक तरह का पारंपरिक नृत्य होता है, जो मां भगवती को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है। 14 दिन तक लगातार भक्त मंदिर में मां की आराधना में लीन रहते हैं और पारंपरिक नृत्य के जरिए मां के प्रति आस्था को दिखाते हैं।

केरल के वायनाड जिले के मनंथावडी शहर से लगभग 3 किलोमीटर दूर वल्लियूरक्कवु भगवती मंदिर आम जनता की पहुंच से दूर है। आदिवासी-जनजातियों का मंदिर होने की वजह से मंदिर के बारे में स्थानीय लोगों को ही पता है। स्थानीय मान्यता है कि मां भगवती यहां वल्लियूरक्कु रूप में विराजमान हैं, जो स्वयं प्रकृति हैं। माना जाता है कि यहां मांगी गई हर मुराद मां पूरी करती है।

--आईएएनएस

पीएस/डीएससी

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