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उत्तराखंड के इस धाम में पिंडी रूप में पूजे जाते हैं बजरंगबली, जानें क्या है सिद्धबली धाम की मान्यता

उत्तराखंड के इस धाम में पिंडी रूप में पूजे जाते हैं बजरंगबली, जानें क्या है सिद्धबली धाम की मान्यता
उत्तराखंड के इस धाम में पिंडी रूप में पूजे जाते हैं बजरंगबली, जानें क्या है सिद्धबली धाम की मान्यता

उत्तराखंड, 15 सितंबर (आईएएनएस)। देवभूमि उत्तराखंड की पावन धरा अपनी आध्यात्मिक ऊर्जा, प्राकृतिक सौंदर्य और सिद्ध पीठों के लिए जानी जाती है। इसी पावन धरा के गढ़वाल क्षेत्र में 'श्री सिद्धबली धाम' स्थित है, जो हनुमानजी के सिद्ध पीठ के रूप में प्रतिष्ठित है। यहां हनुमान जी की पूजा पिंडी के रूप में की जाती है।

प्राकृतिक और शांत वातावरण के बीच बसा यह मंदिर न केवल लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है, बल्कि यहां आने वाले हर भक्त को एक असीम शांति और अलौकिक आध्यात्मिक अनुभूति का अहसास कराता है। मंगलवार को उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने मंदिर के लिए खास पोस्ट की।

उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर मंदिर का वीडियो पोस्ट कर लिखा, "पौड़ी गढ़वाल जिले के कोटद्वार में मौजूद श्री सिद्धबली धाम भगवान हनुमान की असीम कृपा और भक्ति का पवित्र केंद्र है। प्राकृतिक सुंदरता के बीच इस दिव्य धाम में पहुंचकर भक्तों को आध्यात्मिक शांति और पॉजिटिव एनर्जी का अनुभव होता है। पौड़ी गढ़वाल जिले में आने पर आपको भी इस पवित्र धाम के दर्शन जरूर करने चाहिए।"

मान्यता है कि इसी स्थान पर एक सिद्ध बाबा ने तपस्या की थी और उन्हें हनुमान जी के दर्शन हुए थे। इसके बाद यहां बजरंगबली की स्थापना की गई, जिससे इसका नाम 'सिद्धबली' पड़ा। एक और प्रचलित कथा है, जिसके अनुसार गुरु गोरखनाथ अपने गुरु मत्स्येन्द्रनाथ को लेने के लिए निकले थे। मार्ग में हनुमान जी ने रूप बदलकर उनका रास्ता रोक लिया और दोनों के बीच लम्बा युद्ध हुआ, जिसमें कोई भी परास्त नहीं हुआ। अन्ततः हनुमान जी ने अपने वास्तविक स्वरूप में दर्शन दिए और वरदान माँगने को कहा। गुरु गोरखनाथ ने उनसे सदा इसी स्थान पर विराजमान रहने की प्रार्थना की।

मान्यता है कि गुरु गोरखनाथ को यहीं सिद्धि प्राप्त हुई और हनुमान जी के दर्शन भी यहीं हुए इन्हीं दोनों कारणों से इस स्थान का नाम सिद्धबली पड़ा। एक अन्य प्रचलित मत के अनुसार गुरु गोरखनाथ ने अपने अनुयायियों सहित यहां दीर्घकाल तक तप किया, जिससे यह स्थान 'सिद्ध' कहलाया।

स्थानीय मान्यता के अनुसार यह धाम लगभग 400 वर्ष प्राचीन माना जाता है, इसका कोई अभिलेखीय प्रमाण नहीं मिलता।

--आईएएनएस

एनएस/पीएम

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