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मां चली गईं, लेकिन उनके हाथ के बने खाने को 5 साल सम्भालकर रखे रही बेटी, पिता-बेटी ने चखा तो भर आईं आंखें​​​​​​​

मां चली गईं, लेकिन उनके हाथ के बने खाने को 5 साल सम्भालकर रखे रही बेटी, पिता-बेटी ने चखा तो भर आईं आंखें

किसी अपने के गुज़र जाने के बाद उनकी यादों को संजोकर रखना एक बहुत ही भावुक अनुभव होता है। कुछ लोग तस्वीरों में अपने अपनों को ढूंढते हैं, कुछ उनके कपड़ों को संभालकर रखते हैं, तो कुछ उनकी पसंदीदा चीज़ों को यादगार निशानी के तौर पर रखते हैं। लेकिन, जापान की एक कहानी एक ऐसी बेटी के बारे में है जिसने अपनी गुज़र चुकी माँ के बनाए आखिरी खाने को पाँच साल तक संभालकर रखा।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, मिज़ुकी ताकारया की माँ ने अपनी बेटी और पति के लिए प्यार से *बुटा नो काकुनी* (ब्रेज़्ड पोर्क बेली) नाम की डिश बनाई थी। किसी को अंदाज़ा भी नहीं था कि माँ का बनाया यह खाना परिवार के लिए उनकी आखिरी याद बन जाएगा। खाना बनाने के कुछ ही घंटों बाद परिवार पर दुख का पहाड़ टूट पड़ा; ब्रेन हैमरेज की वजह से माँ की अचानक मौत हो गई। इस घटना ने पूरे परिवार को तोड़कर रख दिया।

**खाना फेंकने की हिम्मत भी नहीं हुई**
उनकी अचानक मौत के बाद, उनके बनाए खाने में सिर्फ़ स्वाद ही नहीं था; उसमें उनके हाथ का स्वाद, उनका प्यार और उनके आखिरी पलों की यादें भी बसी थीं। बेटी और पिता उसे फेंकने की हिम्मत नहीं जुटा पाए। इसके बजाय, उन्होंने उसे फ़्रीज़र में रख दिया। उनके लिए, उसे संभालकर रखना माँ की एक कीमती और आखिरी निशानी को अपने पास रखने जैसा था। दिन महीने में और महीने साल में बदलते गए, लेकिन माँ का बनाया आखिरी खाना फ़्रीज़र में वैसा ही रखा रहा।

समय बीतता गया। दिन महीने में और महीने साल में बदलते गए, लेकिन माँ का बनाया आखिरी खाना फ़्रीज़र में ही रहा। परिवार ने उसे पाँच साल तक संभालकर रखा क्योंकि उनके लिए यह सिर्फ़ खाना नहीं था – यह माँ के प्यार और उनके साथ बिताए पलों की एक ठोस निशानी थी।

एक दिन, बेटी ने सोचा कि क्या वह एक बार फिर अपनी माँ के हाथ के खाने का स्वाद ले सकती है। क्या पाँच साल से फ़्रीज़र में रखा खाना खाने लायक होगा? परिवार ने इस मामले में मदद ली। एक एक्सपर्ट शेफ़ की मदद से खाने की जाँच की गई। मकसद सिर्फ़ डिश को दोबारा गर्म करना नहीं था, बल्कि उस प्यारी याद को—जिसे परिवार ने सालों से संजोकर रखा था—एक बार फिर स्वादिष्ट बनाना था।

एक निवाला लेते ही यादें ताज़ा हो गईं
जब डिश आखिरकार तैयार हो गई और पिता-बेटी ने उसे चखा, तो वह सिर्फ़ एक खाना नहीं था। एक निवाला लेते ही बरसों पुरानी यादें ताज़ा हो गईं: माँ की आवाज़, उन्हें रसोई में काम करते देखना, उनका बेटी से यह पूछना कि आज क्या बन रहा है, और परिवार के साथ बिताए वे सादे मगर बेहद कीमती पल। पिता और बेटी, दोनों ही भावुक हो उठे। उनके लिए उस खाने का स्वाद दुनिया में सबसे अलग था; उसमें सिर्फ़ मसाले ही नहीं, बल्कि माँ की यादें भी बसी थीं।

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