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बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान का असर, वीडियो में जाने हर 1000 लड़कों पर अब 930 लड़कियों का जन्म, फिर भी लैंगिक अंतर बरकरार

बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान का असर, वीडियो में जाने हर 1000 लड़कों पर अब 930 लड़कियों का जन्म, फिर भी लैंगिक अंतर बरकरार

देश में बेटियों के जन्म के अनुपात में सुधार के संकेत मिले हैं। ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभियान के शुरुआती जिलों में हुए बदलावों पर आधारित एक रिसर्च में सामने आया है कि अभियान के बाद हर 1000 जन्मों पर करीब 15 अतिरिक्त लड़कियों के जन्म का अनुमान है। इसका असर उन परिवारों में अधिक दिखाई दिया, जिनकी पहली संतान बेटी थी। हालांकि, जन्म के अनुपात में सुधार के बावजूद देश में लैंगिक अंतर पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। वहीं, शिक्षा के क्षेत्र में भी लड़कियों को अब तक कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

हर 1000 लड़कों पर 930 लड़कियों का जन्म

उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2015-16 में देश में हर 1000 लड़कों के जन्म पर 919 लड़कियों का जन्म दर्ज किया जाता था। अब यह अनुपात बढ़कर 930 लड़कियों तक पहुंच गया है। यह बदलाव जन्म के समय लिंग अनुपात में सुधार का संकेत देता है।रिसर्च में ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभियान के शुरुआती जिलों में हुए बदलावों का अध्ययन किया गया। इसके निष्कर्षों के अनुसार, अभियान से जुड़े क्षेत्रों में र 1000 जन्मों पर लगभग 15 अतिरिक्त लड़कियों के जन्म का अनुमान सामने आया। खास तौर पर उन परिवारों में इसका असर अधिक दिखाई दिया, जिनकी पहली संतान बेटी थी।यह अभियान जनवरी 2015 में शुरू किया गया था। इसका उद्देश्य बालिकाओं के प्रति भेदभाव कम करना, जन्म के समय लिंग अनुपात में सुधार लाना और लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा देना है।

757 जिलों में सिर्फ 26 में लड़कियों की संख्या ज्यादा

देश में सुधार के संकेतों के बावजूद स्थिति अभी पूरी तरह संतुलित नहीं हुई है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, देश के 757 जिलों में से केवल 26 जिलों में जन्म के समय लड़कियों की संख्या लड़कों से अधिक दर्ज की गई।यह स्थिति बताती है कि कई क्षेत्रों में बेटियों के जन्म को लेकर सामाजिक सोच और लैंगिक असमानता जैसी चुनौतियां अब भी मौजूद हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, केवल सरकारी योजनाएं शुरू करना पर्याप्त नहीं है। इसके साथ परिवारों और समाज में बेटियों के प्रति समानता का नजरिया विकसित करना भी जरूरी है।जन्म के समय लिंग अनुपात में सुधार को सकारात्मक संकेत माना जा सकता है, लेकिन इसका आकलन करते समय अलग-अलग राज्यों और जिलों की स्थिति को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।

उच्च शिक्षा में अब भी पीछे हैं लड़कियां

बेटियों के जन्म के अनुपात में सुधार के बावजूद शिक्षा के क्षेत्र में असमानता बनी हुई है। यूनेस्को की रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रामीण भारत में 11वीं और 12वीं की पढ़ाई पूरी करने वाले हर 100 लड़कों के मुकाबले केवल 59 लड़कियां ही इस स्तर तक पहुंच पाती हैं।इस अंतर के पीछे आर्थिक परेशानियां, स्कूलों की दूरी, घरेलू जिम्मेदारियां, कम उम्र में शादी और लड़कियों की शिक्षा को लेकर परिवारों की प्राथमिकताएं जैसे कारण हो सकते हैं। हालांकि, अलग-अलग क्षेत्रों में इन कारणों का प्रभाव अलग हो सकता है।माध्यमिक और उच्च माध्यमिक शिक्षा पूरी करने के लिए सुरक्षित परिवहन, स्कूलों में बेहतर सुविधाएं, आर्थिक सहायता और परिवारों का सहयोग महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

जन्म से लेकर शिक्षा तक समान अवसर जरूरी

बेटियों के जन्म के अनुपात में सुधार के साथ उनकी शिक्षा और आगे बढ़ने के अवसरों पर भी ध्यान देना जरूरी है। इसके लिए सरकारी योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन के साथ सामाजिक जागरूकता और स्कूलों तक बेहतर पहुंच सुनिश्चित करनी होगी।‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभियान के शुरुआती जिलों से जुड़े शोध के निष्कर्ष सकारात्मक बदलाव की ओर संकेत करते हैं। हालांकि, जन्म के अनुपात में सुधार को लड़कियों की शिक्षा और समान अवसरों में सुधार के बराबर नहीं माना जा सकता। वास्तविक बदलाव तभी व्यापक होगा, जब बेटियों को जन्म से लेकर उच्च शिक्षा और रोजगार तक समान अवसर मिलेंगे।

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