सरकार को पसंद आते हैं अपने विचारों से सहमत जज, न्यायपालिका की स्वतंत्रता बचाने के लिए मजबूती से खड़ा होना जरूरी: जस्टिस एसके कौल
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश संजय किशन कौल ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता और जजों की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर अहम टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि सरकारें हमेशा ऐसे जजों को पसंद करती रही हैं, जो उनके विचारों से सहमत हों। ऐसे में न्यायपालिका की जिम्मेदारी है कि वह अपनी स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए मजबूती से खड़ी रहे और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करे।
जस्टिस कौल ने पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ के कार्यकाल में जजों की नियुक्ति के तरीके पर भी अपनी असहमति जाहिर की। उन्होंने कहा कि कॉलेजियम को जजों की नियुक्ति के संबंध में स्वतंत्र रूप से फैसले लेने चाहिए। सरकार से पहले ही मंजूरी लेने की कोशिश करने के बजाय नियुक्ति प्रक्रिया में कॉलेजियम की स्वतंत्रता को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। उन्होंने ये बातें अपनी आगामी किताब 'विदाउट फियर ऑर फेवर' पर चर्चा के दौरान कहीं।
उन्होंने कॉकरोच जनता पार्टी के नेता सौरभ दास को मेंटर करने की बात से भी इनकार किया। जस्टिस कौल के मुताबिक, वह दास से एक पत्रकार के तौर पर केवल कुछ बार मिले थे। इस दौरान उन्होंने उन्हें अपनी भाषा में थोड़ा संयम बरतने की सलाह दी थी। उन्होंने यह भी कहा कि अलग-अलग पीढ़ियों के बीच भाषा और अभिव्यक्ति को लेकर सोच में अंतर हो सकता है।
एसके कौल के इंटरव्यू की प्रमुख बातें
1. अनुच्छेद 370 पर फैसला संवैधानिक जज के रूप में लिया
जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने के मामले पर जस्टिस कौल ने कहा कि उन्होंने फैसला कश्मीरी हिंदू के रूप में नहीं, बल्कि एक संवैधानिक न्यायाधीश के तौर पर दिया था। दिसंबर 2023 में वह सुप्रीम कोर्ट की उस पांच सदस्यीय संविधान पीठ का हिस्सा थे, जिसने केंद्र सरकार के अनुच्छेद 370 हटाने के फैसले को बरकरार रखा था।
2. जम्मू-कश्मीर में हिंसा और मानवाधिकार उल्लंघनों की जांच जरूरी
जस्टिस कौल ने कहा कि जम्मू-कश्मीर में लंबे समय से चली आ रही हिंसा और मानवाधिकार उल्लंघनों की घटनाओं को स्वीकार करना जरूरी है। उन्होंने इन घटनाओं की निष्पक्ष जांच के लिए सत्य एवं सुलह आयोग गठित करने का सुझाव दिया। उनके अनुसार, पीड़ितों को न्याय दिलाने और अतीत की गलतियों से आगे बढ़ने के लिए सच्चाई को स्वीकार करना महत्वपूर्ण है।
3. राफेल सौदे पर अदालत की सीमाएं स्पष्ट कीं
राफेल विमान सौदे पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का बचाव करते हुए जस्टिस कौल ने कहा कि रक्षा सौदों के मामलों में अदालत सरकार के फैसलों की जगह अपना फैसला नहीं थोप सकती। ऐसे मामलों में न्यायिक समीक्षा की अपनी सीमाएं होती हैं और अदालत को उन्हीं के दायरे में रहकर निर्णय लेना चाहिए।
4. समलैंगिक जज की नियुक्ति पर क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट में समलैंगिक जज की नियुक्ति से जुड़े मुद्दे पर सौरभ कृपाल के नाम का मामला महत्वपूर्ण रहा है। दिल्ली हाईकोर्ट कॉलेजियम ने अक्टूबर 2017 में उनके नाम की सिफारिश की थी। इसके बाद नवंबर 2021 में सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने भी उनके नाम की अनुशंसा की।
नवंबर 2022 में केंद्र सरकार ने आपत्तियां जताते हुए फाइल वापस भेज दी थी। जनवरी 2023 में कॉलेजियम ने दोबारा उनके नाम की सिफारिश की, लेकिन उनकी नियुक्ति नहीं हो सकी। इस मामले ने न्यायपालिका में विविधता और जजों की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर बहस को चर्चा में ला दिया।
5. डीवाई चंद्रचूड़ से व्यक्तिगत संबंध अच्छे, लेकिन विचार अलग
पूर्व CJI डीवाई चंद्रचूड़ के साथ अपने संबंधों पर जस्टिस कौल ने कहा कि दोनों के व्यक्तिगत रिश्ते अच्छे थे, लेकिन जजों की नियुक्ति को लेकर उनकी सोच अलग थी। उन्होंने कहा कि चंद्रचूड़ कई बार सरकार के सामने अपना पक्ष मजबूती से रखने के मामले में नरम पड़ जाते थे।
6. जजों की नियुक्ति में देरी से योग्य उम्मीदवार हो सकते हैं दूर
जस्टिस कौल ने कहा कि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्तियां समय पर होनी चाहिए। नियुक्ति प्रक्रिया लंबी और जटिल होने से योग्य वकील न्यायाधीश बनने की जिम्मेदारी स्वीकार करने से पीछे हट सकते हैं।
उन्होंने माना कि सरकार को उम्मीदवारों से जुड़ी जरूरी जानकारी देना उचित है, लेकिन इस प्रक्रिया के कारण नियुक्तियों में अनावश्यक देरी नहीं होनी चाहिए। कॉलेजियम को अपनी स्वतंत्रता बनाए रखते हुए समय पर फैसले लेने चाहिए।
7. उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत पर जताई चिंता
जस्टिस कौल ने उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत नहीं मिलने पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि भारत में कई बार दोष साबित होने से पहले लंबे समय तक जेल में रहना ही सजा जैसा बन जाता है।
दोनों पर फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों की कथित साजिश में शामिल होने के आरोप हैं। इन दंगों में 53 लोगों की मौत हुई थी और दोनों के खिलाफ गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम यानी UAPA के तहत मामले दर्ज हैं। उनकी जमानत याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट और दिल्ली हाईकोर्ट से खारिज हो चुकी हैं।
8. राजनीतिक लड़ाई का हथियार न बने अदालत
जस्टिस कौल ने कहा कि अदालतों का इस्तेमाल सरकार के खिलाफ राजनीतिक लड़ाई लड़ने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। राजनीतिक विवादों को दूसरे मंचों पर उठाया जाना चाहिए, हालांकि कानूनी सवालों पर अदालत सुनवाई कर सकती है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि न्यायपालिका का मुख्य दायित्व संविधान की रक्षा करना और सरकार के कामकाज की संवैधानिक सीमाओं के भीतर समीक्षा करना है। अदालत को किसी राजनीतिक दल या विपक्ष के हथियार के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।
उनकी यह टिप्पणी चुनाव आयोग की SIR प्रक्रिया को लेकर विपक्ष की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाओं के बीच आई है। INDIA गठबंधन के नेता इस प्रक्रिया को चुनौती दे चुके हैं। ऐसे समय में जस्टिस कौल की टिप्पणियां न्यायपालिका की स्वतंत्रता, संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता और लोकतांत्रिक व्यवस्था में उनके महत्व पर नई बहस को जन्म देती हैं।

