केंद्र सरकार ने पड़ोसी देशों से एफडीआई के नियमों में ढील दी, वीडियो में देंखे PM मोदी की अध्यक्षता में नई पॉलिसी को मंजूरी
केंद्र सरकार ने मंगलवार को पड़ोसी देशों से आने वाले फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (FDI) के नियमों में महत्वपूर्ण बदलाव की घोषणा की है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में प्रेस नोट 3 के तहत FDI पॉलिसी में संशोधन को मंजूरी दी गई। इस कदम का उद्देश्य भारत में विदेशी निवेश को बढ़ावा देना और निवेश प्रक्रिया को सरल बनाना है, जबकि राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक हितों का ध्यान भी रखा गया है।
सरकार ने स्पष्ट किया कि नए नियमों के अनुसार उन निवेश प्रस्तावों को ऑटोमैटिक मंजूरी मिल जाएगी, जिनमें पड़ोसी देश के निवेशक की कंपनी में हिस्सेदारी 10% से कम होगी और निवेशक के पास कंपनी पर कोई नियंत्रण नहीं होगा। इससे यह सुनिश्चित होगा कि छोटे निवेशक आसानी से भारत में निवेश कर सकें, लेकिन किसी भी तरह का नियंत्रण या रणनीतिक निर्णय विदेशी हाथों में न जाए।
केंद्रीय वित्त मंत्रालय के अधिकारियों ने बताया कि यह बदलाव विशेष रूप से उन देशों के निवेशकों को ध्यान में रखकर किया गया है, जिनके साथ भारत की सीमाएँ साझा हैं। इससे निवेश प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ेगी और विदेशी कंपनियों के लिए भारत में निवेश करने की राह आसान होगी।
इसके अलावा, नई पॉलिसी में स्ट्रैटेजिक मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में निवेश के लिए 60 दिनों की समय सीमा तय कर दी गई है। इसका मतलब है कि इस क्षेत्र में आने वाले निवेश प्रस्तावों को सरकार को 60 दिन के भीतर निर्णय लेना अनिवार्य होगा। इससे निवेशकों का समय बचेगा और निवेश प्रक्रिया तेज़ होगी।
विशेषज्ञों के अनुसार, यह कदम भारत की आर्थिक रणनीति और विदेशी निवेश आकर्षित करने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश यानी FDI का मतलब है कि कोई विदेशी कंपनी या व्यक्ति भारत में किसी कंपनी, फैक्ट्री, व्यवसाय या प्रोजेक्ट में सीधे पैसा लगाता है। यह सिर्फ पूंजी निवेश नहीं है, बल्कि तकनीकी सहयोग, प्रबंधन अनुभव और नए बिजनेस मॉडल लाने का भी अवसर प्रदान करता है।
पिछले कुछ वर्षों में भारत ने FDI नियमों को आसान बनाने के लिए कई सुधार किए हैं। अब पड़ोसी देशों से आने वाले छोटे निवेशकों को ऑटोमैटिक मंजूरी मिलने से निवेशकों में भरोसा बढ़ेगा और आर्थिक गतिविधियों को गति मिलेगी। सरकार का यह कदम उन उद्योगों के लिए भी लाभकारी होगा जो नई तकनीक और उत्पादकता में निवेश चाहते हैं।
राजनीतिक और आर्थिक विशेषज्ञ मानते हैं कि यह नीति बदलाव राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक विकास के बीच संतुलन बनाए रखने का प्रयास है। हालांकि, बड़ी कंपनियों या निवेशकों के लिए जो 10% से अधिक हिस्सेदारी चाहते हैं, उनके लिए अब भी समीक्षा और मंजूरी की प्रक्रिया लागू रहेगी।
इस नीति के लागू होने के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था को विदेशी निवेश के रूप में नए अवसर मिलने की संभावना है, साथ ही रणनीतिक क्षेत्रों में विदेशी नियंत्रण से बचाव भी सुनिश्चित होगा।
सरकार की यह पहल निवेशकों और उद्योग जगत के लिए एक सकारात्मक संकेत मानी जा रही है, जो भारत को वैश्विक निवेश मानचित्र पर और मजबूती से स्थापित करने में मदद करेगी।

