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तमिलनाडु भाषा शहीद दिवस पर सीएम स्टालिन ने दी श्रद्धांजलि, कहा- हिंदी थोपने का हमेशा विरोध करेंगे

चेन्नई, 25 जनवरी (आईएएनएस)। मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने रविवार को राज्य में भाषा शहीद दिवस मनाया और उन लोगों को श्रद्धांजलि दी जिन्होंने ऐतिहासिक हिंदी विरोधी आंदोलनों के दौरान अपनी जान दे दी थी, जिसने तमिलनाडु के भाषाई और राजनीतिक रास्ते को तय किया था।
तमिलनाडु भाषा शहीद दिवस पर सीएम स्टालिन ने दी श्रद्धांजलि, कहा- हिंदी थोपने का हमेशा विरोध करेंगे

चेन्नई, 25 जनवरी (आईएएनएस)। मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने रविवार को राज्य में भाषा शहीद दिवस मनाया और उन लोगों को श्रद्धांजलि दी जिन्होंने ऐतिहासिक हिंदी विरोधी आंदोलनों के दौरान अपनी जान दे दी थी, जिसने तमिलनाडु के भाषाई और राजनीतिक रास्ते को तय किया था।

मुख्यमंत्री याद और विरोध के प्रतीक के तौर पर काले कपड़े पहनकर भाषा संघर्ष के शहीदों को सम्मान देने के लिए चेन्नई के मूलाकोथलम में थलामुथु-नटरासन स्मारक पर गए।

सीएम स्टालिन ने मेमोरियल में थलामुथु और नटरासन की तस्वीरों पर फूल चढ़ाकर श्रद्धांजलि दी। ये दोनों युवा हिंदी थोपे जाने के विरोध में हुए प्रदर्शनों के दौरान मारे गए थे।

मुख्यमंत्री ने "भाषा संघर्ष के शहीदों को सलाम" का नारा लगाया, जो भाषाई गरिमा और संघीय सिद्धांतों के प्रति राज्य की अटूट प्रतिबद्धता को दिखाता है।

मुख्यमंत्री ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, "राज्य में हिंदी की कोई जगह नहीं है। भाषा शहीदों को शानदार श्रद्धांजलि दिवस: न तब, न अब, और न ही कभी हिंदी की यहां कोई जगह होगी। एक ऐसा राज्य जो अपनी भाषा को अपनी जान से भी ज्यादा प्यार करता है, उसने एकजुट होकर हिंदी थोपने के खिलाफ लड़ाई लड़ी। हर बार जब भी इसे थोपा गया, इसने उसी बहादुरी से इसका विरोध किया।"

उन्होंने कहा कि इसने भारतीय उपमहाद्वीप में अलग-अलग भाषा-आधारित राष्ट्रों के अधिकारों और पहचान की रक्षा की। मैं उन शहीदों को कृतज्ञतापूर्वक सम्मान देता हूं जिन्होंने तमिल के लिए अपनी जान दे दी। अब से भाषा संघर्ष में और जानें न जाएं, हमारी तमिल चेतना कभी खत्म न हो और हम हमेशा हिंदी थोपने का विरोध करेंगे।

हर साल 25 जनवरी को भाषा शहीद दिवस मनाया जाता है, उन लोगों को याद करने के लिए जिन्होंने जबरन हिंदी थोपे जाने का विरोध करते हुए अपनी जान गंवाई, खासकर 1930 के दशक के हिंदी विरोधी आंदोलनों और 1965 के बड़े आंदोलन के दौरान। ये आंदोलन इस डर से शुरू हुए थे कि शिक्षा और प्रशासन में हिंदी को लागू करने से तमिल भाषा हाशिये पर चली जाएगी और क्षेत्रीय स्वायत्तता कमजोर हो जाएगी।

1965 के आंदोलन में, जिसमें पूरे तमिलनाडु में छात्रों और आम लोगों ने बड़े पैमाने पर हिस्सा लिया था, कई लोगों की जान गई और इसने राज्य की सामूहिक यादों पर एक गहरी छाप छोड़ी। इस आंदोलन ने राष्ट्रीय भाषा नीति को भी नया रूप दिया।

तमिलनाडु में लगातार विरोध प्रदर्शनों के बाद, केंद्र सरकार ने आश्वासन दिया कि हिंदी के साथ-साथ अंग्रेजी भी एक सहयोगी आधिकारिक भाषा बनी रहेगी। यह एक ऐसा समझौता था जिससे तनाव कम हुआ और भारत के बहुभाषी स्वरूप को मज़बूती मिली।

श्रद्धांजलि समारोह के दौरान उपमुख्यमंत्री उदयनिधि स्टालिन, मंत्री पी.के. सेकर बाबू और एमपी सामिनाथन और चेन्नई की मेयर आर. प्रिया मौजूद थीं। वरिष्ठ अधिकारी, पार्टी नेता और आम लोग भी शामिल हुए, जो तमिलनाडु के सार्वजनिक जीवन में भाषा के सवाल की लगातार प्रासंगिकता को दर्शाता है।

--आईएएनएस

एसएके/एएस

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