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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: धर्म परिवर्तन के बाद पुराने सामाजिक दर्जे पर नहीं मिलेगा आरक्षण का लाभ, वीडियो में जाने मद्रास हाईकोर्ट का आदेश बरकरार

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: धर्म परिवर्तन के बाद पुराने सामाजिक दर्जे पर नहीं मिलेगा आरक्षण का लाभ, वीडियो में जाने मद्रास हाईकोर्ट का आदेश बरकरार

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को आरक्षण से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में कहा कि हिंदू धर्म से किसी गैर-हिंदू धर्म में धर्म परिवर्तन करने वाला व्यक्ति केवल अपने पुराने सामाजिक दर्जे के आधार पर आरक्षण का लाभ मांगने का दावा नहीं कर सकता। शीर्ष अदालत ने इस मामले में मद्रास हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा है। कोर्ट के इस निर्णय से धर्म परिवर्तन के बाद पिछड़े वर्ग में शामिल किए जाने और आरक्षण का लाभ लेने से जुड़े कानूनी सवालों पर चर्चा तेज हो गई है। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि हिंदू सामाजिक व्यवस्था से गैर-हिंदू धार्मिक व्यवस्था में जाने वाला व्यक्ति संविधान के अनुच्छेद 16(4) के तहत केवल अपने पुराने सामाजिक पिछड़ेपन के आधार पर सकारात्मक कार्रवाई का दावा नहीं कर सकता।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला तमिलनाडु सरकार के 9 मार्च 2024 के एक फैसले से जुड़ा है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, सरकार ने पिछड़ा वर्ग, अति पिछड़ा वर्ग, विमुक्त समुदाय और अनुसूचित जाति से संबंधित कुछ लोगों को इस्लाम अपनाने के बाद मुस्लिम पिछड़ा वर्ग में शामिल करने की अनुमति दी थी।इस फैसले के जरिए धर्म परिवर्तन करने वाले लोगों को मुस्लिम पिछड़ा वर्ग की श्रेणी में शामिल करने का रास्ता खोलने की कोशिश की गई थी। हालांकि, इस निर्णय को मद्रास हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। मामले की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने सरकारी फैसले पर रोक लगा दी थी।इसके बाद हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। गुरुवार को शीर्ष अदालत ने मामले पर विचार करते हुए मद्रास हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने आरक्षण के दावे और धर्म परिवर्तन के बीच कानूनी संबंध पर विचार किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 16(4) के तहत सार्वजनिक रोजगार में पिछड़े वर्गों के लिए विशेष प्रावधान किए जा सकते हैं, लेकिन किसी व्यक्ति का पुराने सामाजिक दर्जे के आधार पर दावा अपने आप स्वीकार नहीं किया जा सकता।कोर्ट की टिप्पणी का मुख्य पहलू यह था कि हिंदू व्यवस्था से बाहर किसी अन्य धार्मिक व्यवस्था में जाने के बाद व्यक्ति केवल पहले की सामाजिक पहचान के आधार पर सकारात्मक कार्रवाई का लाभ मांगने का दावा नहीं कर सकता।हालांकि, इस फैसले को सभी प्रकार के आरक्षण और हर धर्म परिवर्तन की स्थिति पर एक समान लागू होने वाला निष्कर्ष मानने से पहले संबंधित कानूनों और मामले के तथ्यों को समझना जरूरी है। अनुसूचित जाति की संवैधानिक पात्रता और अन्य पिछड़े वर्गों की सूची में शामिल होने के नियम अलग-अलग कानूनी प्रावधानों से नियंत्रित होते हैं।

संविधान के अनुच्छेद 16(4) का क्या महत्व है?

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 16 सरकारी नौकरियों में अवसरों की समानता से संबंधित है। इसके अनुच्छेद 16(4) के तहत राज्य को उन पिछड़े वर्गों के लिए नियुक्तियों या पदों में आरक्षण संबंधी प्रावधान करने की अनुमति है, जिनका सरकारी सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है।इस प्रावधान का उद्देश्य सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों को उचित अवसर उपलब्ध कराना है। हालांकि, आरक्षण का लाभ किस वर्ग को मिलेगा और इसके लिए कौन पात्र होगा, यह संबंधित संवैधानिक प्रावधानों, कानूनों और सरकारी सूचियों पर निर्भर करता है।

फैसले का आगे क्या असर हो सकता है?

सुप्रीम कोर्ट द्वारा मद्रास हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखने के बाद तमिलनाडु सरकार के 9 मार्च 2024 के निर्णय से जुड़े विवाद में महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति सामने आई है। इस मामले ने धर्म परिवर्तन, सामाजिक पिछड़ेपन और आरक्षण की पात्रता के बीच संबंध पर फिर से ध्यान केंद्रित किया है। फिलहाल, इस फैसले का वास्तविक दायरा समझने के लिए अदालत के विस्तृत लिखित आदेश और उसमें निर्धारित कानूनी आधारों को देखना महत्वपूर्ण होगा। इससे स्पष्ट होगा कि निर्णय का संबंधित सरकारी आदेश और अलग-अलग आरक्षण श्रेणियों पर किस सीमा तक प्रभाव पड़ता है।

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