सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: हिरासत में लेते ही शुरू होगी 24 घंटे की समयसीमा, फुटेज में देंखे गिरफ्तारी दर्ज करने का समय नहीं होगा आधार
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को गिरफ्तारी और हिरासत से जुड़े अहम फैसले में स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने की 24 घंटे की समयसीमा उसे हिरासत में लेते ही शुरू हो जाएगी। यह समय औपचारिक रूप से गिरफ्तारी दर्ज किए जाने के समय से नहीं गिना जाएगा। कोर्ट ने कहा कि जांच एजेंसियां किसी व्यक्ति को पहले हिरासत में लेकर बाद में उसकी गिरफ्तारी दर्ज करने की प्रक्रिया नहीं अपना सकतीं।जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चंद्रकुर की पीठ ने यह फैसला त्रिपुरा के चार लोगों की याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया। याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि उन्हें हिरासत में लेने और उनकी गिरफ्तारी औपचारिक रूप से दर्ज करने के बीच करीब 21 घंटे का अंतर था।
हिरासत और गिरफ्तारी के बीच अंतर पर कोर्ट की टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि पुलिस किसी व्यक्ति को हिरासत में लेने के बाद गिरफ्तारी दर्ज करने में मनमाना विलंब नहीं कर सकती। संविधान के अनुच्छेद 22(2) के तहत गिरफ्तार व्यक्ति को यात्रा के समय को छोड़कर 24 घंटे के भीतर नजदीकी मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना अनिवार्य है।कोर्ट के फैसले का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इस समयसीमा की गणना व्यक्ति की वास्तविक हिरासत शुरू होने से होगी। यानी पुलिस यह कहकर 24 घंटे की अवधि आगे नहीं बढ़ा सकती कि गिरफ्तारी का मेमो बाद में तैयार किया गया था।
गिरफ्तारी मेमो और केस डायरी की होगी जांच
लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने जांच एजेंसियों को निर्देश दिया है कि गिरफ्तारी मेमो और केस डायरी में हिरासत तथा गिरफ्तारी से संबंधित समय का स्पष्ट उल्लेख किया जाए। मजिस्ट्रेट की जिम्मेदारी होगी कि वह इन दर्ज समयों की जांच करे और यह सुनिश्चित करे कि व्यक्ति को कानून के मुताबिक समय पर अदालत में पेश किया गया है।जरूरत पड़ने पर मजिस्ट्रेट सीसीटीवी फुटेज और अन्य उपलब्ध सबूतों की भी जांच कर सकता है। इससे यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि व्यक्ति को वास्तव में कब हिरासत में लिया गया था और उसे अदालत के सामने कब पेश किया गया।
पुलिस की पूछताछ प्रक्रिया पर पड़ेगा असर
अब तक कई मामलों में पुलिस पहले संदिग्ध को हिरासत में लेकर पूछताछ करती थी और बाद में औपचारिक गिरफ्तारी दर्ज करती थी। इसके बाद गिरफ्तारी मेमो में दर्ज समय के आधार पर 24 घंटे की अवधि की गणना की जाती थी।सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से ऐसी प्रक्रिया पर रोक लगेगी, जिसमें हिरासत का वास्तविक समय छिपाकर गिरफ्तारी का समय बाद में दर्ज किया जाता है। अदालत के निर्देश का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी व्यक्ति को बिना न्यायिक निगरानी के निर्धारित समय से अधिक हिरासत में न रखा जाए।यह फैसला हिरासत में लिए गए लोगों के कानूनी अधिकारों और जांच एजेंसियों की जवाबदेही के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

