महिला होने के कारण नौकरी से इनकार पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, फुटेज में देंखे IOC को 12 लाख मुआवजा देने का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने करीब 38 साल पुराने एक मामले में इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन यानी IOC को हरियाणा की सुमित्रा को 12 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है। मामला महिला होने के आधार पर नौकरी से इनकार करने से जुड़ा है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि केवल महिला होने के आधार पर किसी उम्मीदवार को नौकरी देने से इनकार करना उसके नारीत्व का अपमान है।
यह मामला उस समय का है, जब IOC ने सुमित्रा को नौकरी के लिए चयनित किया था। हालांकि, बाद में कंपनी ने उन्हें नियुक्ति देने से इनकार कर दिया। इसके पीछे यह तर्क दिया गया कि महिला होने के कारण वह गैस सिलेंडर नहीं उठा पाएंगी। नियुक्ति नहीं मिलने के बाद यह मामला अदालतों तक पहुंचा और करीब चार दशक तक कानूनी लड़ाई चलती रही।
नौकरी के बजाय मिलेगा मुआवजा
सुमित्रा अब रिटायरमेंट की उम्र तक पहुंच चुकी हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें अब नौकरी देने के बजाय 12 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया। कोर्ट के आदेश के बाद IOC को यह राशि सुमित्रा को देनी होगी।सुमित्रा ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के अक्टूबर 2025 के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने निचली अदालत के उस फैसले को पलट दिया था, जिसमें IOC को सुमित्रा को मजदूर के अलावा किसी अन्य पद पर नियुक्त करने का निर्देश दिया गया था।
38 साल पुराना है मामला
मामला करीब 38 साल पहले शुरू हुआ था। उस समय सुमित्रा को IOC में नौकरी के लिए चयनित किया गया था, लेकिन कंपनी ने बाद में नियुक्ति रोक दी। कंपनी की ओर से महिला उम्मीदवार के सिलेंडर उठाने में सक्षम नहीं होने का आधार बताया गया था।इसके बाद सुमित्रा ने अपने अधिकार के लिए कानूनी लड़ाई शुरू की। निचली अदालत ने उनके पक्ष में फैसला देते हुए IOC को उन्हें मजदूर के अलावा किसी अन्य पद पर नियुक्त करने का निर्देश दिया था। हालांकि, बाद में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने इस फैसले को पलट दिया।इसके बाद सुमित्रा ने हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सुप्रीम कोर्ट ने मामले पर सुनवाई करते हुए महिला होने के आधार पर रोजगार से वंचित किए जाने के पहलू पर गंभीर टिप्पणी की।
कोर्ट ने लैंगिक भेदभाव पर जताई आपत्ति
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल इस आधार पर किसी महिला को नौकरी से इनकार करना कि वह महिला है, उसके नारीत्व का अपमान है। अदालत की टिप्पणी ने रोजगार के क्षेत्र में लैंगिक समानता के महत्व को रेखांकित किया।हालांकि, मामले को 38 साल बीत चुके हैं और सुमित्रा अब सेवानिवृत्ति की उम्र तक पहुंच चुकी हैं। इसलिए अदालत ने व्यावहारिक स्थिति को देखते हुए उन्हें नौकरी देने के बजाय आर्थिक मुआवजा देने का आदेश दिया।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से लंबे समय से चली आ रही सुमित्रा की कानूनी लड़ाई का अंत हुआ है। मामले में अदालत की टिप्पणी रोजगार के दौरान महिला उम्मीदवारों के साथ समान व्यवहार और लैंगिक भेदभाव से जुड़े सवालों के संदर्भ में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

