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डॉक्टरों पर हमले को लेकर सुप्रीम कोर्ट सख्त, कहा- चुने हुए प्रतिनिधि कानून से ऊपर नहीं; शिवसेना पार्षद की जमानत रद्द

डॉक्टरों पर हमले को लेकर सुप्रीम कोर्ट सख्त, कहा- चुने हुए प्रतिनिधि कानून से ऊपर नहीं; शिवसेना पार्षद की जमानत रद्द

डॉक्टरों और अस्पताल कर्मचारियों पर बढ़ते हमलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त टिप्पणी की है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि कानून के शासन का सम्मान करना हर नागरिक की जिम्मेदारी है, लेकिन जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों पर यह जिम्मेदारी और भी अधिक होती है। किसी जनप्रतिनिधि के पद या प्रभाव की ताकत उसे कानून से ऊपर नहीं रख सकती। कोर्ट ने यह टिप्पणी महाराष्ट्र के ठाणे जिले के डोंबिवली स्थित एक नगर निगम अस्पताल में डॉक्टरों से कथित मारपीट के मामले में की।

शिवसेना पार्षद समेत चार आरोपियों की जमानत रद्द

सुप्रीम कोर्ट ने शिवसेना पार्षद रमेश सुखरिया म्हात्रे समेत चार आरोपियों को मिली जमानत रद्द कर दी। अदालत ने 28 सितंबर के अपने आदेश में सभी आरोपियों को 5 अक्टूबर 2026 तक संबंधित ट्रायल कोर्ट के सामने सरेंडर करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि तय समय तक आत्मसमर्पण नहीं करने पर ट्रायल कोर्ट कानून के अनुसार उनकी हिरासत सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कदम उठा सकता है।

यह मामला 6 जुलाई 2026 को डोंबिवली के शास्त्री नगर म्युनिसिपल अस्पताल में हुई कथित घटना से जुड़ा है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, म्हात्रे और तीन अन्य लोगों पर ड्यूटी पर मौजूद डॉक्टरों के साथ मारपीट और गाली-गलौज करने का आरोप है। मामले में तीन डॉक्टरों के बयान महत्वपूर्ण बताए गए हैं।

डॉक्टरों को डर के माहौल में काम करने को मजबूर नहीं किया जा सकता

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि डॉक्टरों को शारीरिक हिंसा, धमकी या दबाव के डर के बीच स्वतंत्र रूप से काम करने की उम्मीद नहीं की जा सकती। अदालत ने कहा कि चिकित्सा पेशेवरों की सुरक्षा और गरिमा केवल उनका व्यक्तिगत अधिकार नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध आम लोगों को मिलने वाली स्वास्थ्य सेवाओं से है।

पीठ ने यह भी कहा कि इलाज को लेकर असंतोष, किसी मांग को मनवाने या चिकित्सा परिणाम से जुड़ी शिकायत के लिए हिंसा, धमकी या दबाव का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। जनप्रतिनिधि का काम लोगों की समस्याओं को संस्थागत व्यवस्था के जरिए उठाना है, न कि पुलिस, प्रशासन या अदालत की भूमिका खुद संभालना।

घटना को अकेला मामला मानकर नहीं देख सकते

अदालत ने कहा कि मौजूदा घटना को एक अलग-थलग घटना के तौर पर नहीं देखा जा सकता। महाराष्ट्र में डॉक्टरों और अस्पताल कर्मचारियों पर कथित हमलों की अन्य घटनाओं का भी अदालत ने संज्ञान लिया। कोर्ट ने विशेष रूप से म्हात्रे मामले के बाद पालघर में सामने आई ऐसी ही घटना का उल्लेख किया।

सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर भी जोर दिया कि मामले में डॉक्टरों और अस्पताल कर्मचारियों के बयान महत्वपूर्ण हैं। इसलिए ट्रायल कोर्ट को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया कि गवाह बिना किसी डर या दबाव के अदालत के सामने अपना बयान दे सकें। अदालत ने महाराष्ट्र विटनेस प्रोटेक्शन एंड सिक्योरिटी एक्ट, 2017 के तहत आवश्यक सुरक्षा उपलब्ध कराने की संभावना पर भी ध्यान देने को कहा।

5 अक्टूबर तक करना होगा सरेंडर

सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसके तहत आरोपियों को जमानत मिली थी। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि परिस्थितियों में कोई महत्वपूर्ण बदलाव होने पर आरोपी कानून के मुताबिक उचित मंच के सामने दोबारा जमानत की मांग कर सकते हैं। फिलहाल चारों आरोपियों को 5 अक्टूबर तक ट्रायल कोर्ट के सामने आत्मसमर्पण करना होगा।

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