सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी: सार्वजनिक जगहों पर अनिश्चितकाल तक धरना नहीं दे सकते प्रदर्शनकारी, 'प्रदर्शन के नाम पर रास्ता बंद करना गलत'
सार्वजनिक जगहों पर लंबे समय तक धरना-प्रदर्शन करने के अधिकार को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अहम टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा है कि किसी भी प्रदर्शनकारी समूह को सार्वजनिक स्थान पर अनिश्चितकाल तक कब्जा करने की इजाजत नहीं दी जा सकती। प्रदर्शन के अधिकार के साथ यह भी देखना जरूरी है कि इसकी वजह से आम लोगों, दिहाड़ी मजदूरों और कारोबारियों की जिंदगी पर कितना असर पड़ रहा है।
चीफ जस्टिस सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने यह टिप्पणी दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ अक्टूबर में हुए प्रदर्शनों से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान की। सुनवाई में एक तरफ प्रदर्शनकारियों के लिए जंतर-मंतर जैसे स्थानों को उपलब्ध कराने की मांग उठी, तो दूसरी तरफ व्यापारिक संगठनों ने लगातार होने वाले प्रदर्शनों से कारोबार को नुकसान पहुंचने की बात कही।
'एक समूह हमेशा के लिए किसी जगह पर नहीं बैठ सकता'
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के वकील जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाए जाने का विरोध कर रहे थे। वहीं, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने जुलाई में हुए एक प्रदर्शन का उदाहरण देते हुए कहा कि प्रदर्शनकारियों को केवल एक दिन की अनुमति मिली थी, लेकिन वे 17 दिनों तक वहां बैठे रहे। इसके बाद उन्होंने बिना अनुमति संसद की ओर मार्च करने की कोशिश भी की।
इन दलीलों पर चीफ जस्टिस ने कहा कि प्रदर्शन के लिए एक या दो स्थान तय किए जा सकते हैं, लेकिन वहां सभी समूहों को बारी-बारी से अपनी बात रखने का मौका मिलना चाहिए। किसी एक समूह को यह अधिकार नहीं दिया जा सकता कि वह लंबे समय तक उस जगह पर कब्जा करके दूसरों को प्रदर्शन करने से रोक दे।उन्होंने सवाल उठाया कि अगर किसान, मजदूर, ट्रेड यूनियन और बेघर लोग भी अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन करना चाहें, तो उनके लिए जगह कहां होगी?
प्रदर्शन से कारोबार को 2,000 करोड़ रुपये के नुकसान का दावा
सुनवाई के दौरान व्यापारियों की ओर से पेश वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने दावा किया कि लगातार प्रदर्शनों के कारण कारोबार को करीब 2,000 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है।उन्होंने कहा कि त्योहारों के मौसम में बाजार बंद रहने और आवाजाही प्रभावित होने से केवल व्यापारियों को ही नहीं, बल्कि टेम्पो चालकों, दिहाड़ी मजदूरों और सामान ढोने वाले कर्मचारियों की कमाई पर भी असर पड़ता है। ऐसे लोगों की रोजी-रोटी रोजाना की कमाई पर निर्भर करती है।
हालांकि, पीठ के सदस्य जस्टिस जोयमाल्या बागची ने इस दावे पर सवाल उठाते हुए कहा कि कारोबार में गिरावट के लिए केवल प्रदर्शनकारियों को जिम्मेदार कैसे ठहराया जा सकता है? उन्होंने संकेत दिया कि प्रशासन की ओर से लगाई गई बैरिकेडिंग और दुकानों को बंद कराने जैसे कदम भी व्यापार प्रभावित होने की वजह हो सकते हैं।
प्रदर्शन से जुड़े 9 मुद्दों पर होगी अलग-अलग सुनवाई
मंगलवार, 3 नवंबर को हुई सुनवाई में प्रदर्शन से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दे उठाए गए। इनमें महिला पत्रकारों की सुरक्षा, प्रदर्शनकारियों की पहचान के लिए फेशियल रिकॉग्निशन तकनीक का इस्तेमाल और आंदोलन के दौरान सरकार की ओर से मेट्रो, सड़क तथा इंटरनेट सेवाएं बंद किए जाने जैसे विषय शामिल थे।कोर्ट को बताया गया कि मामले से जुड़ी याचिकाओं को नोडल वकीलों ने 9 अलग-अलग श्रेणियों में बांटा है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इन श्रेणियों की याचिकाओं पर अलग-अलग सुनवाई की जाएगी, ताकि मामले को व्यवस्थित तरीके से आगे बढ़ाया जा सके। साथ ही वकीलों के अपनी दलीलें रखने का क्रम भी तय किया जाएगा।
विपक्ष के मार्च से जुड़े मामले पर 23 नवंबर को सुनवाई
सुनवाई के दौरान विपक्षी नेताओं के सुप्रीम कोर्ट आने के समय बनी स्थिति का मुद्दा भी उठाया गया। इसके अलावा राहुल गांधी पर एक गर्भवती महिला पत्रकार को धक्का देने के आरोप का भी जिक्र हुआ।इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने 23 नवंबर को सुनवाई करने की बात कही है। याचिकाकर्ता को निर्देश दिया गया कि वह सभी प्रतिवादियों को याचिका की कॉपी उपलब्ध कराएं, ताकि वे अपना जवाब दाखिल कर सकें।सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी से साफ है कि सार्वजनिक जगहों पर प्रदर्शन के अधिकार और आम नागरिकों की सुविधा के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है। कोर्ट अब इस मामले से जुड़े अलग-अलग पहलुओं पर सुनवाई करेगा।

