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सुप्रीम कोर्ट का फैसला अंतिम, भले ही किसी को गलत लगे: कपिल सिब्बल के बयान पर बोले हरीश साल्वे

सुप्रीम कोर्ट का फैसला अंतिम, भले ही किसी को गलत लगे: कपिल सिब्बल के बयान पर बोले हरीश साल्वे
सुप्रीम कोर्ट का फैसला अंतिम, भले ही किसी को गलत लगे: कपिल सिब्बल के बयान पर बोले हरीश साल्वे

लंदन, 12 अक्टूबर (आईएएनएस)। भारत के पूर्व सॉलिसिटर जनरल हरीश साल्वे ने वरिष्ठ अधिवक्ता और राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल के उस बयान की आलोचना की है, जिसमें उन्होंने कहा है कि उन्हें न्यायपालिका से भरोसा उठ गया है। इसके साथ ही कांग्रेस के संवैधानिक संस्थाओं पर लगातार उठाए जा रहे सवालों पर प्रतिक्रिया दी।

पूर्व सॉलिसिटर जनरल हरीश साल्वे ने कपिल सिब्बल को सलाह दी है कि अगर अगर उनका न्यायपालिका से भरोसा उठ गया है, तो उनको अपने मुवक्किलों को उसी हिसाब से सलाह देनी चाहिए।

साल्वे ने कहा, "अगर मेरा न्यायपालिका पर भरोसा न हो, तो मैं खुद अदालत में पेश नहीं होऊंगा। आप अदालत में पेश होते हैं, न्यायाधीश से फैसला मांगते हैं और जब न्यायाधीश आपकी बात से सहमत नहीं होते, तो आप कहते हैं कि आपका भरोसा उठ गया। हमें सिखाया गया था कि ऐसी टिप्पणियां नहीं करनी चाहिए।"

उन्होंने कहा, "न्यायपालिका पर भरोसा और किसी फैसले की शुद्धता दो अलग-अलग बातें हैं। आप कह सकते हैं कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला आपको निराशाजनक लगा या आपके अनुसार वह गलत है। आप अपने तर्क दे सकते हैं। मतभेद हो सकते हैं और न्यायाधीशों से भी गलतियां हो सकती हैं। सुप्रीम कोर्ट का फैसला अंतिम होता है, भले ही किसी को वह गलत लगे। लेकिन यह कहना कि न्यायपालिका से भरोसा उठ गया है, अलग अर्थ रखता है। इससे यह संकेत मिलता है कि न्यायपालिका जानबूझकर गलत फैसले दे रही है। अगर किसी का ऐसा मतलब नहीं है, तो उसे स्पष्ट करना चाहिए कि वह सिर्फ किसी खास फैसले से निराश है।"

कांग्रेस द्वारा लगातार चुनाव आयोग और न्यायपालिका पर सवाल उठाने पर पूर्व सॉलिसिटर जनरल हरीश साल्वे ने कहा, "आज भारत में एक सरकार है और भविष्य में दूसरी सरकारें भी आएंगी। पहले कांग्रेस की सरकार थी और भविष्य में भी कांग्रेस की सरकार आ सकती है। कौन शासन करेगा, यह जनता चुनावों में तय करेगी। लेकिन हमें शासन की संस्थागत व्यवस्था को कमजोर नहीं करना चाहिए और न ही संस्थाओं से जनता का भरोसा उठने देना चाहिए। अगर आप चुनाव जीतकर किसी राज्य में सरकार बनाते हैं, तो आप भी नहीं चाहेंगे कि लोग सड़कों पर उतरकर कहें कि सरकार को संविधान के अनुसार काम नहीं करने दिया जा रहा है।"

उन्होंने आगे कहा, "हमें अपनी संस्थाओं को कमजोर या निशाना नहीं बनाना चाहिए। संविधान ने न्यायपालिका, विधायिका, निर्वाचित कार्यपालिका और चुनाव आयोग जैसी अलग-अलग संस्थाएं बनाई हैं। सभी का अपना अधिकार क्षेत्र है और अदालतें नियंत्रण एवं संतुलन की व्यवस्था बनाए रखती हैं। अगर आप यह कहने लगें कि सिर्फ आपकी बात सही है और जो आपसे असहमत है, वह समझौता कर चुका है या राजनीतिक रूप से प्रेरित है, तो विचारों का वास्तविक आदान-प्रदान खत्म हो जाता है। यह उसी सोच जैसा है जिसमें कहा जाता है, "मेरा सच और तुम्हारा सच।" अगर आप मुझसे सहमत हैं, तो आप अच्छे हैं और अगर असहमत हैं, तो बुरे हैं। लोकतंत्र इस तरह नहीं चल सकता।"

--आईएएनएस

ओपी/एएस

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