स्पेस से वापसी के बाद क्यों जरूरी है रिहैबिलिटेशन? एस्ट्रोनॉट्स के लिए चुनौती से कम नहीं
नई दिल्ली, 4 जून (आईएएनएस)। स्पेस की यात्रा जितनी रोमांचक होती है, पृथ्वी पर लौटने के बाद शरीर को सामान्य स्थिति में लाना उतना ही चुनौतीपूर्ण होता है। लंबे समय तक कम गुरुत्वाकर्षण वाले वातावरण यानी माइक्रोग्रैविटी में रहने के कारण एस्ट्रोनॉट्स के शरीर में कई बदलाव आ जाते हैं। यही वजह है कि स्पेस मिशन से लौटने के बाद एस्ट्रोनॉट्स के लिए रिहैबिलेशन (पुनर्वास) बेहद जरूरी माना जाता है।
एस्ट्रोनॉट शुभांशु शक्ला ने इंस्टाग्राम पर किए पोस्ट के जरिए एस्ट्रोनॉट्स के रिहैबिलेशन के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि अंतरिक्ष से लौटने वाले एस्ट्रोनॉट्स के लिए मिशन पूरा होने के बाद सबसे बड़ी चुनौती उनके अपने शरीर को फिर से पृथ्वी के सामान्य माहौल में ढालने की होती है। लंबे समय तक माइक्रोग्रैविटी में रहने के बाद शरीर को दोबारा पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण का एहसास कराना आसान नहीं होता। इसीलिए स्पेस मिशन के बाद रिहैबिलिटेशन (पुनर्वास) कार्यक्रम बेहद जरूरी हो जाता है।
शुभांशु शक्ला ने बताया, जब आप हफ्तों या महीनों तक अंतरिक्ष में रहते हैं, तो शरीर ऐसे माहौल का आदी हो जाता है जहां ऊपर-नीचे का कोई खास फर्क नहीं रहता। गुरुत्वाकर्षण की कमी के कारण मांसपेशियां कमजोर हो जाती हैं, हड्डियां घनत्व खोने लगती हैं, संतुलन बिगड़ जाता है और रक्त संचार भी प्रभावित होता है। पृथ्वी पर लौटते ही शरीर को अचानक भारीपन का एहसास होता है, जिससे चलना-फिरना, खड़े होना और सामान्य काम करना भी मुश्किल हो जाता है।
ऐसे में पोस्ट फ्लाइट रिहैबिलिटेशन एक वैज्ञानिक तरीके से तैयार किया गया कार्यक्रम है। इसे हर एस्ट्रोनॉट की उम्र, मिशन की अवधि और शारीरिक स्थिति के अनुसार अलग-अलग बनाया जाता है। इसमें धीरे-धीरे व्यायाम शुरू किए जाते हैं। शुरुआत में हल्के स्ट्रेचिंग और बैलेंसिंग एक्सरसाइज होती हैं। बाद में ताकत बढ़ाने वाले वेट ट्रेनिंग, कार्डियो व्यायाम और कोऑर्डिनेशन सुधारने वाले अभ्यास शामिल किए जाते हैं। विशेषज्ञ प्रशिक्षक पूरे कार्यक्रम की निगरानी करते हैं और धीरे-धीरे व्यायाम बढ़ाते रहते हैं।
शुभांशु शक्ला ने अपने प्रशिक्षक एमिल का जिक्र करते हुए बताया कि कई बार उन्हें लगता था कि प्रशिक्षक उन्हें गिराने के नए-नए तरीके ढूंढ रहे हैं। लेकिन यही तरीका है सीखने का। गिरकर, लड़खड़ाकर और फिर संभलकर शरीर को दोबारा मजबूत बनाया जाता है। रिहैबिलिटेशन का मुख्य लक्ष्य एस्ट्रोनॉट को फिर से सामान्य जीवन में लाना है, ताकि वे बिना किसी परेशानी के चल-फिर सकें और भविष्य के मिशनों के लिए तैयार रहें।
इस प्रक्रिया में फिजियोथेरेपी, न्यूट्रिशन डाइट, मांसपेशियों की मॉनिटरिंग और मानसिक स्वास्थ्य का भी ध्यान रखा जाता है। कई एस्ट्रोनॉट्स को शुरू के कुछ हफ्तों में चक्कर आने, थकान और जोड़ों के दर्द की शिकायत होती है, जिसे रिहैबिलिटेशन के जरिए धीरे-धीरे ठीक किया जाता है।
--आईएएनएस
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