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स्मृति शेष: आधुनिक भारतीय कला के जनक राजा रवि वर्मा, जिनकी कला से घर-घर पहुंचे देवी-देवता

स्मृति शेष: आधुनिक भारतीय कला के जनक राजा रवि वर्मा, जिनकी कला से घर-घर पहुंचे देवी-देवता
स्मृति शेष: आधुनिक भारतीय कला के जनक राजा रवि वर्मा, जिनकी कला से घर-घर पहुंचे देवी-देवता

नई दिल्ली, 1 अक्टूबर (आईएएनएस)। भारतीय कला के इतिहास के सबसे महान चित्रकारों और कलाकारों में से एक राजा रवि वर्मा उन रचनात्मक हस्तियों में से हैं, जिन्होंने अपने काम के जरिए देवी-देवताओं के स्वरूप को हर घर तक पहुंचाया। इसी वजह से उन्हें आधुनिक भारतीय कला का जनक भी कहा जाता है। उनकी पुण्यतिथि हर साल 2 अक्टूबर को मनाई जाती है।

राजा रवि वर्मा का जन्म 29 अप्रैल 1848 को केरल के किलिमानूर पैलेस में एक शाही परिवार में हुआ था। उनके पिता एझुमाविल नीलकंठन भट्टातिरीपाद संस्कृत और आयुर्वेद के विद्वान थे और उनकी माता उमा अम्बाबाई थंपुरट्टी एक कवयित्री और लेखिका थीं। रवि वर्मा के दो भाई-बहन थे। बहन का नाम मंगला बाई और भाई का नाम राजा वर्मा था। उनके भाई राजा वर्मा भी उन्हीं की तरह एक चित्रकार थे और उन्होंने जीवन भर रवि वर्मा के साथ मिलकर काम किया।

रवि वर्मा को बचपन से ही चित्रकारी और पेंटिंग में काफी रुचि थी। वह अक्सर दीवारों और कागजों पर चित्र उकेरा करते थे। हालांकि, रवि के रुचि और कला को उनके चाचा ने पहचाना और उनकी प्रतिभा को निखारा। उन्होंने त्रावणकोर के शासक के संरक्षण में चित्रकला सीखी और तेल चित्रकला में महारत हासिल की।

वे पहले ऐसे भारतीय थे, जिन्होंने भारतीय विषयों और शैलियों के साथ-साथ परिप्रेक्ष्य और पश्चिमी तकनीकों का इस्तेमाल किया। उन्होंने भारतीय विषयों और पौराणिक कथाओं के साथ यूरोपीय ऑयल पेंटिंग और यथार्थवाद का अद्भुत मेल किया।

रवि वर्मा ने अपनी चित्रकला और पेंटिंग से रामायण, महाभारत और हिंदू पौराणिक कथाओं के पात्रों जैसे माता लक्ष्मी, सरस्वती, श्री कृष्ण आदि को कैनवास पर सजीव मानवीय रूप में उकेरा। उनके चित्रों की खासियत थी कपड़ों की सिलवटों, गहनों की चमक और इंसानी भावनाओं की गहराई।

राजा रवि वर्मा ने कला को केवल महलों तक सीमित न रखकर आम आदमी तक पहुंचाने के लिए 1894 में मुंबई में एक लिथोग्राफिक प्रेस की स्थापना की। इस प्रेस से उनके चित्रों की सस्ती और रंगीन प्रतियां छपी, जिससे देवी-देवताओं के चित्र घर-घर तक पहुंच गए।

राजा रवि वर्मा के व्यक्तिगत जीवन की बात करें तो उन्होंने 1866 में मात्र 18 वर्ष की आयु में मावेलिकारा के शाही परिवार की 12 वर्षीय भागीरथी बाई से शादी की। दंपती दो बेटे और तीन बेटियों के माता-पिता थे। रवि वर्मा का निधन 2 अक्टूबर 1906 को हुआ, लेकिन अपनी चित्रकारी और पेंटिंग के लिए वे सदा याद किए जाएंगे।

--आईएएनएस

डीके/डीकेपी

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