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स्किंक : नुकसान न पहुंचाने वाली 'सांप की मौसी', इकोसिस्टम के लिए महत्वपूर्ण

नई दिल्ली, 21 फरवरी (आईएएनएस)। स्किंक, जिसे आम बोलचाल में 'सांप की मौसी' या 'बभनी' कहा जाता है, छिपकलियों की प्रजाति मानी जाती है। यह देखने में इतनी चिकनी और फुर्तीली होती है कि इसे 'सांप की मौसी' तक कहा जाता है। हालांकि, यह मानव जाति को किसी तरह का नुकसान नहीं पहुंचाती है।
स्किंक : नुकसान न पहुंचाने वाली 'सांप की मौसी', इकोसिस्टम के लिए महत्वपूर्ण

नई दिल्ली, 21 फरवरी (आईएएनएस)। स्किंक, जिसे आम बोलचाल में 'सांप की मौसी' या 'बभनी' कहा जाता है, छिपकलियों की प्रजाति मानी जाती है। यह देखने में इतनी चिकनी और फुर्तीली होती है कि इसे 'सांप की मौसी' तक कहा जाता है। हालांकि, यह मानव जाति को किसी तरह का नुकसान नहीं पहुंचाती है।

स्किंक के बारे में आम धारणाएं भी हैं। कुछ लोग मानते हैं कि इन्हें छूने से पैसे मिलते हैं, लेकिन ये सिर्फ लोक किवदंती है। असल में ये कीड़े खाकर फसल और घरों को नुकसान से बचाती हैं। हालांकि, इनकी पहचान मुश्किल होने और सांप जैसी दिखने से ये अक्सर गलतफहमी का शिकार हो जाती हैं। स्किंक इकोसिस्टम के लिए फायदेमंद हैं क्योंकि ये कीटों की संख्या नियंत्रित रखती हैं।

भारत सरकार के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय और जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के अनुसार, ये छोटे, चिकने शरीर वाली, चमकदार स्केल्स वाली छिपकलियां हैं। ये विषैली नहीं होतीं, बल्कि बहुत सतर्क, फुर्तीली और तेज चलने वाली होती हैं। ये मुख्य रूप से छोटे कीड़ों, मकड़ियों और अन्य बिना रीढ़ वाले जीवों का शिकार करती हैं, जिससे इकोसिस्टम को संतुलित रखने में अहम भूमिका निभाती हैं।

स्किंक पूरे भारत में हर तरह के क्षेत्रों में पाई जाती हैं, यह रेगिस्तान से लेकर घने जंगल, हिमालय की तलहटी से तटीय इलाकों तक पाई जाती हैं। बभनी का घरों, गैरेज, खेल के मैदानों, झीलों के किनारे और खुले मैदानों में पाया जाना आम है। इनका शरीर लंबा होता है, गर्दन लगभग नहीं दिखती और कई प्रजातियों में पैर बहुत छोटे या बिल्कुल नहीं होते हैं। इसी वजह से ये रेंगने में सांपों जैसी लगती हैं, जिससे लोग इन्हें जहरीला समझकर मार देते हैं। लेकिन सच ये है कि स्किंक पूरी तरह हानिरहित होती हैं और इंसानों के लिए कोई खतरा नहीं पैदा करतीं।

जेडएसआई की साल 2020 में प्रकाशित महत्वपूर्ण रिपोर्ट 'स्किंक्स ऑफ इंडिया' में बताया गया है कि भारत में स्किंक की कुल 62 प्रजातियां पाई जाती हैं। इनमें से लगभग 57 प्रतिशत प्रजातियां एंडेमिक हैं, मतलब ये सिर्फ भारत में ही मिलती हैं और कहीं और नहीं। दुनिया भर में स्किंक की कुल 1,602 प्रजातियां हैं, जो छिपकलियों का सबसे बड़ा परिवार है, लेकिन भारत में इनकी हिस्सेदारी वैश्विक विविधता का 4 प्रतिशत से भी कम है। यह रिपोर्ट जेडएसआई के 16 क्षेत्रीय केंद्रों में चार साल की मेहनत का नतीजा है, जिसमें 4 हजार से ज्यादा नमूनों का अध्ययन किया गया। इसमें सभी प्रजातियों की पहचान, आदतें, आवास और प्रजनन की जानकारी दी गई है। यह स्किंक पर भारत का पहला ऐसा विस्तृत मोनोग्राफ है।

क्षेत्रीयता के तौर पर बात करें तो वेस्टर्न घाट में 24 प्रजातियां हैं, जिनमें से 18 एंडेमिक हैं। डेक्कन पेनिनसुलर में 19 प्रजातियां हैं, जिनमें 13 एंडेमिक हैं। पूर्वोत्तर भारत में 14 प्रजातियों के रिकॉर्ड हैं, जिनमें दो एंडेमिक हैं। भारत में स्किंक के 16 जेनेरा हैं, जिनमें से चार पूरी तरह एंडेमिक हैं, जैसे सेप्सोफिस, बरकुड़िया, कैस्ट्लिया और रिस्टेला।

--आईएएनएस

एमटी/एएस

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