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एसआईआर प्रक्रिया में शुरुआत से ही कई गलतियां, चुनाव आयोग उठाए सख्त कदम: ओपी रावत

एसआईआर प्रक्रिया में शुरुआत से ही कई गलतियां, चुनाव आयोग उठाए सख्त कदम: ओपी रावत
एसआईआर प्रक्रिया में शुरुआत से ही कई गलतियां, चुनाव आयोग उठाए सख्त कदम: ओपी रावत

भोपाल, 23 सितंबर (आईएएनएस)। चुनाव आयोग और विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर चल रहे विवाद पर पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि एसआईआर प्रक्रिया में शुरू से ही गलतियां हुई हैं और हाल के घटनाक्रमों ने चुनाव आयोग जैसी संस्था की साख पर सवाल खड़े किए हैं।

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने समाचार एजेंसी आईएएनएस से बातचीत करते हुए कहा, "इस बारे में अलग-अलग राय हैं। सबसे अच्छा यही होगा कि तीनों साथ बैठें और प्रेस कॉन्फ्रेंस करके साफ करें कि मामला क्या था। अगर असहमति होती तो फैसला नहीं लिया जा सकता था, क्योंकि चुनाव आयोग का फैसला या तो आम सहमति से या बहुमत से ही लिया जा सकता है, किसी और तरह से नहीं।"

रावत ने कहा, "यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है। ऐसा कभी नहीं होना चाहिए, क्योंकि चुनाव आयोग एक ऐसी संस्था है, जिसकी दुनिया भर में यह प्रतिष्ठा है कि वह हमेशा निष्पक्ष चुनाव कराती है, इसलिए इस विवाद का समाधान चुनाव आयुक्तों और मुख्य चुनाव आयुक्त को मिलकर करना चाहिए।"

उन्होंने एसआईआर प्रक्रिया में खामियों का जिक्र करते हुए कहा, "एसआईआर प्रक्रिया में शुरू से ही यानी बिहार चुनाव के समय से ही कई गलतियां हुई हैं। धीरे-धीरे चुनाव आयोग ने प्रक्रिया में सुधार किया और इसे बेहतर बनाने की कोशिश की, लेकिन हाल ही में अपीलेट ट्रिब्यूनल ने पश्चिम बंगाल के मामले में फैसला सुनाया कि जिन 93 प्रतिशत वोटरों को हटाया गया था, वे योग्य थे और उन्हें वोटर लिस्ट में वापस जोड़ा जाना चाहिए। इन लोगों को वोट देने के मौके से वंचित रखा गया। यह एक गंभीर गड़बड़ी है।"

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ने वोटर रजिस्ट्रेशन के लिए जरूरी फॉर्म 6 में किए गए बदलावों को भी गलत बताया। उन्होंने कहा कि फॉर्म 6 में किए गए बदलाव पूरी तरह से गलत और गैर-कानूनी हैं। उन्होंने चुनाव आयोग के अंदर मतभेदों की बातों को बहुत गंभीर और दुर्भाग्यपूर्ण बताया।

वहीं, इस पूरे विवाद पर भारत के चुनाव आयोग में पूर्व जॉइंट डायरेक्टर और प्रोटोकॉल प्रमुख डॉ. मोहम्मद अमीन ने अलग राय रखी। उन्होंने कहा, "चुनाव आयुक्तों के बीच कोई मतभेद नहीं है। वे हमेशा मिलकर काम करते हैं और एक-दूसरे का सहयोग करते हैं। जब भी बैठकें होती हैं तो तीनों चुनाव आयुक्त, मुख्य चुनाव आयुक्त और दो चुनाव आयुक्त मिलकर फैसले लेते हैं। अंतिम फैसला हमेशा उनके बीच चर्चा के बाद ही लिया जाता है।"

उन्होंने कहा कि जहां तक ई-वोटर्स, एसआईआर और वोटर लिस्ट से जुड़ी चिंताओं की बात है, तो कुछ आपत्तियां हो सकती हैं, लेकिन ऐसी आपत्तियां सार्वजनिक नहीं की जातीं। फैसले आंतरिक रूप से चर्चा के बाद लिए जाते हैं। जहां तक सॉफ्टवेयर की बात है, तो इसे हमेशा दिल्ली से ही ऑपरेट किया गया है। चुनाव आयोग ने यह सॉफ्टवेयर उन मामलों की पहचान करने के लिए विकसित किया था, जहां लोगों के नाम दो जगहों पर दर्ज हैं।

--आईएएनएस

एसएके/डीकेपी

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