राजस्थान समेत हरियाणा और उत्तर प्रदेश में शीतला अष्टमी का पर्व विशेष महत्व रखता है। यह त्योहार होली के बाद कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाया जाता है और माता शीतला की पूजा का अवसर होता है। माता शीतला को संक्रामक और चर्म रोगों से रक्षा करने वाली देवी माना जाता है।
शीतला अष्टमी के अवसर पर पारंपरिक रूप से व्रती और उसका परिवार एक दिन पहले बना बासी 'ठंडा खाना' खाते हैं। इस परंपरा के कारण इसे बसौड़ा (Basoda 22026) भी कहा जाता है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, बासी भोजन खाने और माता शीतला की पूजा करने से रोग और संक्रमण से सुरक्षा मिलती है।
हालांकि, इस बार शीतला अष्टमी को लेकर थोड़ी असमंजस की स्थिति बन गई है। लोग जानना चाहते हैं कि इस बार किस स्थिति और शुभ मुहूर्त में माता शीतला की पूजा की जाएगी। इस तरह की उलझन अक्सर तिथि, नक्षत्र और वार के संयोग में बदलाव के कारण होती है।
पंडित और ज्योतिष विशेषज्ञ बताते हैं कि इस बार पूजा का शुभ मुहूर्त दोपहर 12:15 बजे से शुरू होकर 1:45 बजे तक रहेगा। इस समय के भीतर माता शीतला का अभिषेक, हवन और प्रसाद वितरण करना शुभ माना जाता है। भक्तगण इस समय के अनुसार पूजा करने से स्वास्थ्य और परिवार में सुख-शांति की कामना कर सकते हैं।
विशेष रूप से, इस दिन व्रती सफाई और स्वच्छता का विशेष ध्यान रखते हैं। घर और पूजा स्थल को पूरी तरह से साफ किया जाता है, ताकि माता शीतला की कृपा और संक्रामक रोगों से सुरक्षा सुनिश्चित हो सके। बासी भोजन, हल्का और ठंडा होने के कारण पाचन और स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी माना जाता है।
राजस्थान और अन्य पड़ोसी राज्यों में बसौड़ा पर्व के दौरान मेला, भजन-कीर्तन और सामुदायिक पूजा का आयोजन भी किया जाता है। यह न केवल धार्मिक महत्व रखता है बल्कि सामाजिक एकता और पारिवारिक मेलजोल को भी बढ़ाता है।
कुल मिलाकर, शीतला अष्टमी 2026 का बसौड़ा पर्व धार्मिक, स्वास्थ्य और सामाजिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इस बार पूजा के शुभ मुहूर्त और परंपराओं का पालन करके भक्तगण अपने घर और परिवार में स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि और रोगमुक्ति की कामना कर सकते हैं।

