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श्री अधिपुरीश्वर मंदिर: सर्प दोष और राहु-केतु की पीड़ा से छुटकारा पाने के लिए दूर-दूर से आते हैं भक्त

नई दिल्ली, 12 नवंबर (आईएएनएस)। दक्षिण भारत में भगवान विष्णु को समर्पित कई मंदिर मौजूद हैं, लेकिन यहां की धरती भगवान शिव के बिना अधूरी है। जहां भगवान विष्णु होते हैं, वहां भगवान शिव का होना अनिवार्य है।
श्री अधिपुरीश्वर मंदिर: सर्प दोष और राहु-केतु की पीड़ा से छुटकारा पाने के लिए दूर-दूर से आते हैं भक्त

नई दिल्ली, 12 नवंबर (आईएएनएस)। दक्षिण भारत में भगवान विष्णु को समर्पित कई मंदिर मौजूद हैं, लेकिन यहां की धरती भगवान शिव के बिना अधूरी है। जहां भगवान विष्णु होते हैं, वहां भगवान शिव का होना अनिवार्य है।

चेन्नई में भगवान शिव का ऐसा मंदिर मौजूद है, जिसे दूसरा श्री कालहस्ती मंदिर कहा जाता है। माना जाता है कि जो भी श्री कालहस्ती मंदिर नहीं जा पाता, वह इस मंदिर में पूजा कर सकता है। हम बात कर रहे हैं श्री अधिपुरीश्वर मंदिर की, जहां भगवान शिव विराजमान हैं।

श्री अधिपुरीश्वर मंदिर चेन्नई के पल्लीकरनई में बना है। इस मंदिर के पास से वेलाचेरी-तांबरम मुख्य मार्ग भी है, जो मंदिर तक पहुंचने का रास्ता आसान बनाता है। मंदिर में भगवान शिव अथिपुरीश्वर के रूप में विराजमान हैं और उनके साथ उनकी पत्नी श्री शांता नयगी भी हैं।

माना जाता है कि ऋषि व्याघ्रपाद ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए ऐसे स्थान की खोज की, जहां एक साथ बहुत सारे बिल्व वृक्ष हों। ऐसे में उन्होंने धरती का कोना-कोना छानने की कोशिश की और उनकी मेहनत से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उनकी खोज पूरी करने के लिए बाघ के पैर प्रदान किए, जिससे वो जल्द से जल्द ऐसी जगह ढूंढ सकें। इस घटना की जानकारी जब राज्य के राजा को मिली तो उन्होंने वहां ऋषि के पूजा स्थान पर मंदिर का निर्माण करवाया।

माना जाता है कि जो लोग सर्प दोष से पीड़ित हैं या राहु-केतू के प्रभाव से बचने और मोक्ष प्राप्ति के लिए श्री कालहस्ती मंदिर नहीं जा सकते, वे इस मंदिर में आकर 'परिहार पूजा' करा सकते हैं। ऐसा करने से उन्हें श्री कालहस्ती मंदिर जितना ही पुण्य मिलेगा।

इस मंदिर की एक खासियत ये भी है कि मासी महीने (फरवरी और मार्च के महीनों में) में 15 और 30 तारीख को सूर्य की किरणें सीधे मंदिर के गर्भगृह में पड़ती हैं। कहा जाता है कि खुद भगवान सूर्य भगवान शिव का आशीर्वाद लेने के लिए आए हैं। अध्यात्म के साथ-साथ मंदिर वास्तुकला की दृष्टि से भी खास है।

मंदिर के अंदर कई उप मंदिर बने हैं, जिनकी अलग-अलग विशेषता है। मंदिर में भगवान अंजनेयार, नवग्रह मंदिर, स्वर्ण आकर्षण भैरवर, राहू और केतु, महा विष्णु, चंडिकेश्वर और महेश्वरी के मंदिर हैं। 700 साल पुराने मंदिर में प्रदोष और महाशिवरात्रि के दिन खास पूजा रखी जाती है।

मंदिर की वास्तुकला की बात करें तो मंदिर की शुरुआत में ही त्रिस्तरीय राजगोपुर है, जो पूर्वमुखी है। गर्भगृह के प्रवेश द्वार पर भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित है और मां शांता के मंदिर की दीवारों पर कामाक्षी, लक्ष्मी और सरस्वती की कलाकृति बनी हैं।

मंदिर सर्प दोष और राहु-केतु की पीड़ा को दूर करने के लिए जाना जाता है और संतान प्राप्ति का आशीर्वाद लेने के लिए भक्त यहां आते हैं।

--आईएएनएस

पीएस/वीसी

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