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छत्तीसगढ़: 16 पत्थर के स्तंभों पर टिकी सदियों पुरानी आस्था की विरासत, यहां विराजती हैं 'त्रिदेवियां'

बिलासपुर, 31 मई (आईएएनएस)। देश ही नहीं, बल्कि दुनियाभर में भगवती के कई दिव्य व प्राचीन मंदिर हैं, जहां आस्था, सुंदरता के साथ इतिहास की बेहतरीन झलक देखने को मिलती है। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले से करीब 25 किलोमीटर दूर स्थित रतनपुर में भी ऐसा ही एक मंदिर है। श्री महामाया देवी मंदिर प्रमुख शक्ति स्थलों में गिना जाता है। 12वीं शताब्दी में निर्मित यह भव्य मंदिर अपनी धार्मिक मान्यता, ऐतिहासिक विरासत और वास्तुकला के कारण श्रद्धालुओं और इतिहास प्रेमियों के आकर्षण का केंद्र रहा है।
छत्तीसगढ़: 16 पत्थर के स्तंभों पर टिकी सदियों पुरानी आस्था की विरासत, यहां विराजती हैं 'त्रिदेवियां'

बिलासपुर, 31 मई (आईएएनएस)। देश ही नहीं, बल्कि दुनियाभर में भगवती के कई दिव्य व प्राचीन मंदिर हैं, जहां आस्था, सुंदरता के साथ इतिहास की बेहतरीन झलक देखने को मिलती है। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले से करीब 25 किलोमीटर दूर स्थित रतनपुर में भी ऐसा ही एक मंदिर है। श्री महामाया देवी मंदिर प्रमुख शक्ति स्थलों में गिना जाता है। 12वीं शताब्दी में निर्मित यह भव्य मंदिर अपनी धार्मिक मान्यता, ऐतिहासिक विरासत और वास्तुकला के कारण श्रद्धालुओं और इतिहास प्रेमियों के आकर्षण का केंद्र रहा है।

हरे-भरे पहाड़ों और सैकड़ों तालाबों से घिरे रतनपुर की पहचान उसकी धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी हुई है। महामाया देवी मंदिर न केवल आस्था के प्रमुख केंद्र में से एक है, बल्कि यह छत्तीसगढ़ के गौरवशाली इतिहास, कला और संस्कृति का भी महत्वपूर्ण प्रतीक है। यहां पहुंचने वाला हर श्रद्धालु और पर्यटक मंदिर की दिव्यता, स्थापत्य भव्यता और ऐतिहासिक महत्व से प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाता।

सोलह विशाल पत्थर के स्तंभों पर टिका यह मंदिर आज भी मध्यकालीन भारतीय स्थापत्य कला की उत्कृष्टता का उदाहरण माना जाता है। रतनपुर कभी कलचुरी राजाओं की राजधानी हुआ करता था। इसी काल में महामाया मंदिर का निर्माण हुआ। मान्यता है कि कलचुरी शासक राजा रत्नदेव ने देवी की आराधना के बाद इस क्षेत्र को अपनी राजधानी बनाया था। इसके बाद यहां मंदिरों, किलों, महलों और तालाबों का निर्माण हुआ।

महामाया मंदिर सिद्ध शक्तिपीठ है, जो मूल रूप से त्रिदेवी स्वरूप- महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती को समर्पित है। समय के साथ मंदिर में कई बदलाव हुए और वर्तमान स्वरूप में यहां देवी महामाया की विशेष पूजा की जाती है। गर्भगृह में स्थापित देवी की प्रतिमा महिषासुर मर्दिनी और सरस्वती के स्वरूप का अद्भुत संगम मानी जाती है।

मंदिर की वास्तुकला इसकी सबसे बड़ी विशेषताओं में शामिल है। नागर शैली में निर्मित यह मंदिर उत्तर दिशा की ओर मुख किए हुए है और एक विशाल जलकुंड के किनारे स्थित है। लगभग 18 इंच मोटी चारदीवारी से घिरा यह मंदिर 16 पत्थर के मजबूत स्तंभों पर खड़ा है। मंदिर में प्रयुक्त कई मूर्तियां और शिल्पकृतियां पुराने खंडित मंदिरों से लाई गई थीं, जिनमें कुछ जैन मंदिरों की कलाकृतियां भी शामिल हैं।

मंदिर परिसर में केवल महामाया देवी ही नहीं, बल्कि महाकाली, भद्रकाली, सूर्य देव, भगवान विष्णु, भगवान शिव, भैरव और हनुमान जी की प्रतिमाएं भी स्थापित हैं। इससे यह परिसर एक व्यापक धार्मिक केंद्र के रूप में विकसित हुआ है।

महामाया मंदिर के निकट स्थित कांतिदेवल मंदिर भी ऐतिहासिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। माना जाता है कि इसका निर्माण 1039 में संतोष गिरि नामक तपस्वी ने कराया था। बाद में कलचुरी शासक पृथ्वीदेव द्वितीय ने इसका विस्तार कराया। अपनी सुंदर नक्काशी, चार प्रवेश द्वारों और आकर्षक स्थापत्य के कारण यह मंदिर भी पर्यटकों और शोधकर्ताओं को आकर्षित करता है।

रतनपुर के आसपास कई प्राचीन किले, महल और मंदिरों के अवशेष भी मौजूद हैं। इनमें पहाड़ी पर स्थित कदीदेओल शिव मंदिर विशेष रूप से उल्लेखनीय है। 11वीं शताब्दी के इस मंदिर के अवशेष आज भी कलचुरी शासनकाल की स्थापत्य समृद्धि का प्रमाण देते हैं।

महामाया मंदिर का सबसे भव्य स्वरूप नवरात्रि के दौरान देखने को मिलता है। इस दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं। मंदिर में ज्योति कलश प्रज्ज्वलित किए जाते हैं और पूरा परिसर भक्तिमय वातावरण से भर जाता है। दूर-दूर से आने वाले श्रद्धालु देवी महामाया का आशीर्वाद लेने के साथ-साथ मंदिर के संरक्षक देवता कालभैरव के भी दर्शन करते हैं। स्थानीय मान्यता है कि कालभैरव के दर्शन किए बिना महामाया मंदिर की यात्रा अधूरी मानी जाती है।

--आईएएनएस

एमटी/डीकेपी

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