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शिक्षा मंत्रालय ने स्कूल न जाने वाले बच्चों को मुख्यधारा में लाने की रणनीति की समीक्षा की

नई दिल्ली, 16 मई (आईएएनएस)। शिक्षा मंत्रालय के स्कूली शिक्षा और साक्षरता विभाग (डीओएसईएल) के सचिव संजय कुमार की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय बैठक बुलाई गई। इस बैठक का उद्देश्य स्कूल न जाने वाले बच्चों - विशेष रूप से 14-18 वर्ष आयु वर्ग के बच्चों - के मुद्दे पर विचार-विमर्श करना और एनआईओएस की प्रस्तावित नई पहल के कार्यान्वयन की रणनीति पर चर्चा करना था।
शिक्षा मंत्रालय ने स्कूल न जाने वाले बच्चों को मुख्यधारा में लाने की रणनीति की समीक्षा की

नई दिल्ली, 16 मई (आईएएनएस)। शिक्षा मंत्रालय के स्कूली शिक्षा और साक्षरता विभाग (डीओएसईएल) के सचिव संजय कुमार की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय बैठक बुलाई गई। इस बैठक का उद्देश्य स्कूल न जाने वाले बच्चों - विशेष रूप से 14-18 वर्ष आयु वर्ग के बच्चों - के मुद्दे पर विचार-विमर्श करना और एनआईओएस की प्रस्तावित नई पहल के कार्यान्वयन की रणनीति पर चर्चा करना था।

इस बैठक में डीओएसईएल की संयुक्त सचिव प्राची पांडे, राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान (एनआईओएस) के अध्यक्ष प्रोफेसर अखिलेश मिश्रा एवं सचिव कर्नल शकील अहमद, शिक्षा मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी, विभिन्न राज्य सरकारों के प्रतिनिधि, चिन्हित पायलट जिलों के जिला कलेक्टर/जिला मजिस्ट्रेट और एनआईओएस तथा राज्य शिक्षा विभागों के अधिकारियों ने भाग लिया।

प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए डीओएसईएल के सचिव संजय कुमार ने स्कूल की पढ़ाई बीच में ही छोड़ने वाले बच्चों की गंभीर समस्या पर प्रकाश डाला और कहा कि उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, कक्षा एक में दाखिला लेने वाले हर 100 बच्चों में से केवल 62 बच्चे ही कक्षा 12 तक पहुंच पाते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि नवीनतम पीएलएफएस अनुमानों के अनुसार, 14-18 आयु वर्ग के दो करोड़ से अधिक बच्चे इस समय स्कूल नहीं जाते हैं।

उन्होंने कहा कि आर्थिक मजबूरियां, घरेलू जिम्मेदारियां और आजीविका से जुड़ी चुनौतियां उन मुख्य कारणों में से हैं, जिनकी वजह से बच्चे स्कूली शिक्षा से वंचित रह जाते हैं। तत्काल हस्तक्षेप की आवश्यकता पर जोर देते हुए कुमार ने इस बात पर बल दिया कि हर बच्चे को कम से कम माध्यमिक व उच्च माध्यमिक स्तर तक की शिक्षा मिलनी चाहिए और साथ ही उसे स्थानीय आर्थिक अवसरों के अनुरूप रोजगारपरक कौशल भी सिखाए जाने चाहिए।

उन्होंने आगे कहा कि जहां मुख्य जोर बच्चों को फिर से औपचारिक स्कूली शिक्षा से जोड़ने पर होना चाहिए, वहीं जो बच्चे नियमित स्कूलों में वापस नहीं लौट पा रहे हैं, उन्हें ओपन और डिस्टेंस लर्निंग (ओडीएल) व्यवस्थाओं के जरिए राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान (एनआईओएस) और राज्य मुक्त विद्यालयों जैसे लचीले शिक्षण माध्यमों से जोड़ा जाना चाहिए। कुमार ने जमीनी स्तर पर इस पहल को प्रभावी ढंग से लागू करने और इसे एक राष्ट्रव्यापी अभियान में बदलने में जिला कलेक्टरों तथा जिला प्रशासन की अहम भूमिका पर भी जोर दिया।

डीओएसईएल की संयुक्त सचिव प्राची पांडे ने कहा कि स्कूल न जाने वाले बच्चों की समस्या को मिशन मोड में हल किया जा रहा है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि प्रस्तावित पहल में डेटा-आधारित दृष्टिकोण अपनाया जाएगा, जिसमें अंतिम छोर तक पहुंचने पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। उन्होंने स्कूल न जाने वाले बच्चों की प्रभावी पहचान, नामांकन और उन्हें स्कूल में बनाए रखना सुनिश्चित करने हेतु राज्य, जिला और स्थानीय स्तर पर विभिन्न विभागों के बीच तालमेल की आवश्यकता को रेखांकित किया। इसके अलावा, यह भी बताया गया कि इस पहल के औपचारिक शुभारंभ से पहले, तैयारी से जुड़ी गतिविधियां - जिनमें एनआईओएस फैसिलिटेटर्स का नामांकन, स्टार्टर किट का वितरण, प्रारंभिक सर्वेक्षण और बच्चों का शुरुआती नामांकन शामिल है - पूरी की जाएंगी।

एनआईओएस के अध्यक्ष प्रोफेसर अखिलेश मिश्रा ने कहा कि शिक्षा आशा, गरिमा और अवसर का प्रतीक है। उन्होंने यह भी कहा कि मुख्य चुनौती उन बच्चों तक पहुंचने की है, जो शिक्षा प्रणाली से कटे हुए हैं। उन्होंने इस पहल को शैक्षिक समावेशन का एक ऐसा ‘जन-आंदोलन’ बताया, जिसका उद्देश्य लचीले एवं समावेशी शैक्षिक माध्यमों के जरिए बच्चों तथा युवाओं को सीखने के अवसरों से फिर से जोड़ना है।

एनआईओएस के सचिव कर्नल शकील अहमद ने इस पहल के संचालनात्मक ढांचे पर एक विस्तृत प्रस्तुति दी। इस प्रस्तुति में स्कूल न जाने वाले बच्चों की पहचान एवं वर्गीकरण, एनआईओएस फैसिलिटेटर्स की तैनाती, ऐप-आधारित मैपिंग एवं मॉनिटरिंग सिस्टम, प्रोत्साहन तंत्र, जिला-स्तरीय एकीकरण रणनीतियां और चरणबद्ध कार्यान्वयन की योजनाओं को शामिल किया गया था।

इस पहल के शुरुआती कार्यान्वयन हेतु, ऐसे पायलट जिलों की पहचान की गई जहां स्कूल न जाने वाले बच्चों की संख्या बहुत अधिक है। इनमें ओडिशा, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, बिहार, उत्तर प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, मध्य प्रदेश और दिल्ली के जिले शामिल हैं। पहले चरण में, यह नई पहल देश के 10 जिलों में लागू की जाएगी। इसे लागू करने में मदद हेतु, इसमें शामिल राज्यों के साथ ‘प्रतिबद्धता ज्ञापन’ (एमओसी) पर हस्ताक्षर किए जाएंगे। इन जिलों से मिली सीख के आधार पर, इस कार्यक्रम का बाद में पूरे देश में विस्तार किया जाएगा।

भाग लेने वाले राज्यों और जिला प्रशासनों ने इस पहल के सफल कार्यान्वयन के लिए अपने पूर्ण सहयोग और समर्थन का आश्वासन दिया। राज्यों से यह भी अनुरोध किया गया कि वे प्रासंगिक डेटा साझा करें और इस रूपरेखा तथा संचालन संबंधी दिशानिर्देशों को और अधिक सुदृढ़ बनाने हेतु सुझाव प्रदान करें।

बैठक का समापन इस सामूहिक संकल्प के साथ हुआ कि कोई भी बच्चा शिक्षा प्रणाली से बाहर न रहे और सभी बच्चों को शिक्षा, कौशल विकास, तथा एक गरिमामय भविष्य के अवसर उपलब्ध कराए जाएं।

--आईएएनएस

एमएस/

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