शेखपुरा की मिट्टी से निकली ‘तंजौर पेंटिंग’ की चमक, जीविका दीदी कृष्णा देवी बनीं आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर
शेखपुरा, 29 जनवरी (आईएएनएस)। बिहार के शेखपुरा जिले के गगरी पंचायत अंतर्गत छोटे से गांव गुनहेसा से निकलकर देश की पारंपरिक कला में अपनी अलग पहचान बनाने वाली कृष्णा देवी आज कई महिलाओं के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं।
सीमित संसाधन, कम पढ़ाई और सामाजिक तानों के बावजूद कृष्णा देवी ने अपने हुनर, धैर्य और मेहनत के बल पर यह साबित कर दिया कि मजबूत इरादों के आगे परिस्थितियां भी रास्ता बना देती हैं। जीविका दीदी के रूप में जुड़कर उन्होंने न सिर्फ आत्मनिर्भरता हासिल की, बल्कि तंजौर पेंटिंग जैसी पारंपरिक और बारीक कला को बिहार में नई पहचान दिलाई।
जीविका दीदी और तंजौर पेंटिंग आर्टिस्ट कृष्णा देवी ने आईएएनएस से खास बातचीत में बताया कि उन्होंने इस कला की विधिवत ट्रेनिंग चेन्नई में ली थी, जहां उनके पति पहले रहते थे।
उन्होंने बताया कि तंजौर पेंटिंग की प्रक्रिया बेहद धैर्य और मेहनत की मांग करती है। सबसे पहले प्लाई बोर्ड लिया जाता है, जिसे कपड़े से कवर कर चूना, गोंद और अन्य मिश्रणों से भगवान की उभरी हुई प्रतिमा तैयार की जाती है। इसके बाद उस पर रंग और 22 कैरेट सोने की परत लगाई जाती है। एक पेंटिंग को पूरी तरह तैयार करने में करीब 15 दिन का समय लगता है, जबकि बड़े साइज की पेंटिंग में इससे अधिक समय भी लग सकता है।
कृष्णा देवी ने बताया कि उन्होंने अपनी कला का प्रदर्शन कई राज्यों में किया है और दिल्ली जैसे बड़े शहरों में उनकी भगवान की प्रतिमाओं की अच्छी बिक्री होती है। अब तक बिहार से करीब चार लाख रुपए का कारोबार हो चुका है। उन्होंने कहा कि उन्हें पत्र के माध्यम से विभिन्न प्रदर्शनियों की जानकारी दी जाती है, जिसमें आने-जाने और ठहरने की व्यवस्था भी की जाती है।
तंजौर पेंटिंग आर्टिस्ट प्रवीण कुमार ने बताया कि उनकी पत्नी वर्ष 2016 से जीविका से जुड़ी थीं। उस समय वे खुद चेन्नई में मजदूरी का काम करते थे। साल 2020 में कोरोना महामारी के कारण तमिलनाडु में रोजगार खत्म हो गया और परिवार को मजबूरी में बिहार लौटना पड़ा। इसके बाद उन्होंने जीविका कार्यालय से संपर्क किया, जहां उनकी कला को देखा गया और सराहा गया। जीविका के माध्यम से उन्हें प्रदर्शनियों और मेलों में भाग लेने का अवसर मिला। जीविका से जुड़े होने के कारण उन्हें लोन भी आसानी से मिल गया, जिससे उन्होंने अपने कारोबार को आगे बढ़ाया।
प्रवीण कुमार ने बताया कि शुरुआत में लोग उनकी कला का मजाक उड़ाते थे, लेकिन आज वही लोग उनके काम की सराहना करते हैं। नोएडा हाट में उन्हें मंत्रालय की ओर से पुरस्कृत भी किया गया। अगर जीविका का सहारा नहीं मिलता, तो उनके लिए यह सब संभव नहीं हो पाता। जीविका और उद्योग विभाग के सहयोग से आज उनकी आमदनी में उल्लेखनीय सुधार हुआ है।
तंजौर पेंटिंग की सबसे बड़ी खासियत इसमें इस्तेमाल होने वाली 22 कैरेट सोने की परत होती है, जो इसे न केवल आकर्षक बनाती है, बल्कि इसकी कीमत और महत्व भी बढ़ाती है। यह कला अत्यंत बारीक, समय-साध्य और धैर्य की परीक्षा लेने वाली होती है। कृष्णा देवी ने पति के साथ मिलकर इस पारंपरिक दक्षिण भारतीय कला को बिहार में जीवित रखने का संकल्प लिया। हालांकि, शुरुआत में उन्हें कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। बिहार में कच्चा माल उपलब्ध नहीं होने के कारण आज भी उन्हें तमिलनाडु जाना पड़ता है, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी।
सरकारी मेलों और कार्यक्रमों से मिली पहचान ने कृष्णा देवी के जीवन की दिशा ही बदल दी। जीविका की मदद से उन्हें पटना के गांधी मैदान, भुवनेश्वर, इंदौर, गुरुग्राम और हरियाणा जैसे बड़े शहरों में आयोजित मेलों और प्रदर्शनियों में स्टॉल लगाने का अवसर मिला। धीरे-धीरे लोगों की नजर इस अनोखी कला पर पड़ी और तंजौर पेंटिंग की मांग बढ़ने लगी। आज उनकी बनाई पेंटिंग्स न सिर्फ बिहार, बल्कि अन्य राज्यों में भी खूब पसंद की जा रही हैं और लाखों रुपए की बिक्री हो चुकी है।
कृष्णा देवी की पेंटिंग्स में भगवान कृष्ण, राम, विष्णु, लक्ष्मी और शिव के चित्र प्रमुख रूप से बनाए जाते हैं। लकड़ी के तख्ते पर चूना, गोंद और मिट्टी से उभरी आकृतियां तैयार कर उन पर लाल, हरे, नीले और सुनहरे जैसे गहरे व आकर्षक रंग भरे जाते हैं। आज कृष्णा देवी की सफलता की कहानी इस बात का उदाहरण है कि सही मार्गदर्शन, सरकारी सहयोग और आत्मविश्वास के साथ ग्रामीण महिलाएं भी पारंपरिक कला के जरिए न सिर्फ अपनी पहचान बना सकती हैं, बल्कि आर्थिक रूप से सशक्त होकर समाज में बदलाव की मिसाल भी पेश कर सकती हैं।
--आईएएनएस
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