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शास्त्रीय संगीत जगत के 'गंधर्व कुमार': बीमारी को मात देकर मंच पर वापसी करने वाले 'शिवपुत्र', 'धुनुगम राग' के साथ लाई क्रांति

नई दिल्ली, 7 अप्रैल (आईएएनएस)। भारतीय शास्त्रीय संगीत जगत कई शानदार सितारों से जगमग है। खास बात है कि कई सितारे आज के समय में भले ही इस दुनिया में नहीं हैं, मगर उनकी कला और उनकी रचना प्रशंसकों के बीच खास बनी हुई है। ऐसे ही कलाकार थे बीमारी को मात देकर मंच पर शानदार वापसी करने वाले ‘शिवपुत्र’ पंडित कुमार गंधर्व।
शास्त्रीय संगीत जगत के 'गंधर्व कुमार': बीमारी को मात देकर मंच पर वापसी करने वाले 'शिवपुत्र', 'धुनुगम राग' के साथ लाई क्रांति

नई दिल्ली, 7 अप्रैल (आईएएनएस)। भारतीय शास्त्रीय संगीत जगत कई शानदार सितारों से जगमग है। खास बात है कि कई सितारे आज के समय में भले ही इस दुनिया में नहीं हैं, मगर उनकी कला और उनकी रचना प्रशंसकों के बीच खास बनी हुई है। ऐसे ही कलाकार थे बीमारी को मात देकर मंच पर शानदार वापसी करने वाले ‘शिवपुत्र’ पंडित कुमार गंधर्व।

उन्होंने भारतीय शास्त्रीय संगीत जगत में एक अनोखी क्रांति लाई, ‘धुनुगम राग’ की रचना कर संगीत को नई दिशा दी और साबित किया कि राग सिर्फ स्वरों का समूह नहीं, बल्कि भाव और जीवन का रूप होता है। 8 अप्रैल को महान शास्त्रीय गायक पंडित कुमार गंधर्व की जयंती है।

उनका जन्म 8 अप्रैल 1924 को कर्नाटक के बेलगाम जिले के सुलेभावी गांव में हुआ था और असली नाम शिवपुत्र सिद्धारमैया कोमकली था। घर में संगीत का माहौल था, इसलिए बचपन से ही संगीत उनकी रगों में बस गया। मात्र सात साल की उम्र में उनकी असाधारण गायकी देखकर सब हैरान रह जाते थे। पिता उन्हें अपने गुरु स्वामी वल्लभदास के पास ले गए। स्वामीजी ने उनकी आवाज सुनते ही कहा, “यह तो गंधर्व है।” उसी दिन से उन्हें ‘कुमार गंधर्व’ नाम मिल गया, जो बाद में पूरे देश में मशहूर हो गया।

कुमार गंधर्व ने शास्त्रीय संगीत में कई नए प्रयोग किए। उन्होंने लोक धुनों का गहरा अध्ययन कर ऐसे रागों की रचना की जो पहले कभी नहीं सुने गए थे। इन नए रागों को ‘धुनुगम राग’ कहा जाता है। उनका मानना था कि राग को नियमों में बांधने की बजाय उसे भाव और जीवन देना चाहिए। उन्होंने जयपुर, आगरा और ग्वालियर घरानों की विशेषताओं को मिलाकर अपनी अनोखी गायकी शैली विकसित की।

लेकिन उनकी जिंदगी आसान नहीं थी। युवावस्था में उन्हें टीबी हो गई, जिससे एक फेफड़ा बुरी तरह प्रभावित हो गया। डॉक्टरों ने कहा कि अब सामान्य तरीके से गाना मुश्किल होगा। कई लोग समझ गए कि उनकी संगीत यात्रा यहीं खत्म हो गई, लेकिन कुमार गंधर्व ने हार नहीं मानी। उन्होंने अपनी सांस लेने की तकनीक बदली, गायकी में बदलाव किया और रागों के साथ नए प्रयोग शुरू किए। बीमारी के बावजूद, उन्होंने मंच पर शानदार वापसी की और अपनी कला को और भी गहरा, संवेदनशील और अनूठा बना दिया।

उनकी गायकी में भाव की गहराई, स्वरों की स्पष्टता और प्रयोग की स्वतंत्रता तीनों का अद्भुत संयोग था। उन्होंने ऋतुसंगीत और बालगंधर्व जैसे विशेष कार्यक्रमों के जरिए संगीत को आम लोगों तक भी पहुंचाया। पंडित कुमार गंधर्व का योगदान भारतीय शास्त्रीय संगीत को नई ऊंचाई देने वाला रहा। उनकी मेहनत और साहस को सम्मान देते हुए भारत सरकार ने उन्हें 1977 में पद्म भूषण और 1990 में पद्म विभूषण से नवाजा। आज भी उनकी गायकी सुनने वाले मंत्रमुग्ध हो जाते हैं।

--आईएएनएस

एमटी/डीकेपी

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