एससीओ समिट में ईरान को भारत से बड़ी उम्मीदें: पीएम मोदी और पेजेश्कियन की मुलाकात में होर्मुज और चाबहार पर रहेगा फोकस
नई दिल्ली, 31 अगस्त (आईएएनएस)। ईरान के लिए इस बार का एससीओ समिट सिर्फ कूटनीतिक मंच नहीं, बल्कि एक बड़ी राहत की उम्मीद है। अमेरिका के साथ जारी तनाव और होर्मुज स्ट्रेट पर मंडरा रहे संकट के बीच ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन की नजरें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ होने वाली बैठक पर टिकी हैं।
तेहरान मानता है कि भारत ही वह देश है जो पश्चिम एशिया में बिगड़ते हालात के बीच शांति का पुल बन सकता है। ईरान चाहता है कि भारत अपने वैश्विक प्रभाव का इस्तेमाल कर अमेरिका के साथ जारी गतिरोध को खत्म करने में मदद करे, ताकि खाड़ी क्षेत्र में स्थिरता लौटे और चाबहार जैसे अधूरे पड़े साझा प्रोजेक्ट्स को फिर से रफ्तार मिल सके।
एससीओ समिट के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन के साथ प्रस्तावित द्विपक्षीय बैठक को लेकर मेजर जनरल (रिटायर्ड) ध्रुव कटोच ने कहा, "एससीओ सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी और ईरानी राष्ट्रपति पेजेश्कियन के बीच होने वाली द्विपक्षीय बैठक में होने वाली बातचीत बहुत जरूरी है। ये समय की भी जरूरी है, क्योंकि एक तरफ अमेरिका और ईरान के बीच सीजफायर चल रहा है, लेकिन ये टूट भी रहा है। समस्या ये है कि होर्मुज स्ट्रेट पर भारत की निर्भरता ज्यादा है। इस समय पर ये बातचीत बहुत महत्वपूर्ण है।
मेजर जनरल (रिटायर्ड) ने आगे कहा कि पीएम मोदी की तरफ से शांति के रास्ते की तरफ एक कोशिश होगी, जिससे ईरान और अमेरिका के बीच जो युद्ध चल रहा है, वो पूरी तरह से खत्म हो जाए। अगर ये तनाव जारी रहा तो भारत की ऊर्जा सप्लाई पर प्रभाव पड़ेगा? भारत का संबंध बाकी देशों के साथ जैसा है, यह उस स्थिति में है कि किसी भी स्थिति में एक शांतिदूत की तरह काम कर सकता है। भारत के लिए होर्मुज स्ट्रेट से तेल, गैस और फर्टिलाइजर की सप्लाई होती है। ऐसे में इस क्षेत्र में स्थिरता कैसे लाई जाए, इस पर चर्चा हो सकती है।
उन्होंने कहा कि भारत चाबहार पोर्ट पर किस तरह से आगे की कार्रवाई करेगा, इसे लेकर भी चर्चा हो सकती है। भारत ने जितनी विकास परियोजनाएं शुरू की थीं, वो सब बंद हो चुकी हैं। अभी आगे देखते हैं कि क्या होता है।
नेपाल में मचाई तबाही को लेकर उन्होंने कहा कि इस त्रासदी में भारत ने जो भूमिका निभाई है, वो बहुत अच्छी है। नेपाल को जो मदद चाहिए थी, उसके लिए भारत पहले से ही आगे था, क्योंकि ये हिमालय का क्षेत्र है, इस तरह की तबाही से पहले से तैयारी करके बचा जा सकता था। इससे यह सीख मिली है कि जो भी देश इसके साथ ताल्लुक रखते हैं, उनमें तिब्बत, नेपाल और भारत इस प्रकार से सहयोग करे कि अगर हादसे आगे हों तो पहले से चेतावनी कैसे दी जा सकती है।
मेजर जनरल (सेवानिवृत्त) संजय सोनी ने पीएम मोदी और ईरानी राष्ट्रपति के मुलाकात को लेकर कहा कि इस मुलाकात के दौरान काफी मुद्दों पर चर्चा होगी। इससे पहले जब वो अक्टूबर 2024 में मिले थे और अब युद्ध की स्थिति में मिलेंगे। ऐसे माहौल में ये मुलाकात काफी महत्वपूर्ण है। दुनिया में कहीं भी युद्ध होता है तो भारत की एक ही नीति है कि ये समय युद्ध का नहीं है।
नेपाल त्रासदी को लेकर उन्होंने कहा कि भारत ने 62 हजार टन का सहयोग भेजा और रेस्क्यू टीम वो अभी रेकी के लिए जा रही हैं, ताकि वो पता कर सकें कि वहां जरूरतें क्या हैं। नेपाल ने शुरू में रेस्क्यू टीम के लिए मना किया था, लेकिन मदद के लिए मना नहीं किया। दरअसल, जब भूचाल आया तो कई देशों की रेस्क्यू टीम पहुंची, तो उनमें समन्वय में काफी दिक्कत हो रही थी। ये लोग चाह रहे थे कि इनके देश की सेना, सिविल रेस्क्यू टीमें वहां मिलकर काम करें। बाहर से वो पैसे, राशन, दवाइयों समेत इस तरह की मदद के लिए वो तैयार हैं।
--आईएएनएस
केके/डीकेपी

