सार्वजनिक स्थानों पर नमाज पर रोक के हाईकोर्ट के फैसले का मोहसिन रजा ने किया स्वागत
लखनऊ, 2 मई (आईएएनएस)। सार्वजनिक स्थानों पर नमाज पढ़ने को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट के हालिया फैसले पर राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। भाजपा नेता मोहसिन रजा ने इस निर्णय का स्वागत करते हुए इसे कानून के समान पालन की दिशा में जरूरी कदम बताया है।
भाजपा नेता मोहसिन रजा ने समाचार एजेंसी आईएएनएस से बातचीत में कहा कि बार-बार सार्वजनिक जगहों पर कब्जा करके नमाज पढ़ने को लेकर चिंताएं जताई गई हैं। यह सऊदी अरब नहीं है; यह भारत है, जहां कानून सबके लिए एक जैसा है। लोगों को यह समझना चाहिए कि जहां हम शुक्रवार की नमाज पढ़ते हैं, वहीं मैंने कई जगहों पर देखा है कि लोग मस्जिदों के बाहर छोटी चटाइयां बिछाकर खड़े होकर नमाज पढ़ते हैं।
उन्होंने कहा कि खास मौकों पर प्रशासन द्वारा कभी-कभार इंतजाम किए जाते हैं लेकिन नियमित रूप से ऐसा करना जरूरी नहीं है। इससे आम जनता को परेशानी होती है और कभी-कभी सांप्रदायिक तनाव भी पैदा हो सकता है।
उन्होंने कहा कि मेरा मानना है हाईकोर्ट के फैसले से भी लोगों को यह समझना चाहिए कि ऐसी प्रथाओं को बंद कर देना चाहिए लेकिन अगर किसी खास जगह पर ऐसा किया जाता है और सड़कें जाम हो जाती हैं, तो इसके लिए जिम्मेदार कौन होगा? इसलिए, मेरा मानना है कि ऐसी प्रथाओं पर रोक लगाना सही है।
वहीं, सूफी फाउंडेशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष कशिश वारसी ने भी अदालत के फैसले का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक जमीन पर नमाज अदा करना किसी का अधिकार नहीं है और सभी नागरिकों के अधिकार समान हैं। उन्होंने लोगों से अपील की कि इस मुद्दे का राजनीतिकरण न किया जाए और अदालत के आदेश का सम्मान किया जाए।
दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी के पूर्व सांसद डॉ. एसटी हसन ने इस फैसले पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि नमाज पढ़ना कोई अपराध नहीं है और देश में विभिन्न धर्मों के लोग एक-दूसरे की आस्था का सम्मान करते आए हैं। उनके मुताबिक, वर्तमान माहौल ऐसा बना दिया गया है कि धार्मिक गतिविधियों के लिए न्यायपालिका का सहारा लेना पड़ रहा है।
इस मुद्दे पर ऑल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड के महासचिव मौलाना यासूब अब्बास ने भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि अदालत का यह फैसला केवल एक धर्म तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि सभी धार्मिक और गैर-धार्मिक गतिविधियों पर समान रूप से लागू होना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि आम तौर पर सार्वजनिक स्थानों पर रोजाना नमाज नहीं पढ़ी जाती बल्कि विशेष अवसरों जैसे जुमे, ईद या बकरीद पर ही लोग एकत्रित होते हैं।
उन्होंने आरोप लगाया कि सड़कों पर अन्य आयोजनों जैसे बारात या डीजे कार्यक्रमों पर इस तरह के फैसले नहीं लिए जाते, जिससे यह एकतरफा कार्रवाई प्रतीत होती है। मौलाना अब्बास ने कहा कि इस मुद्दे पर बोर्ड की बैठक कर फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने पर विचार किया जाएगा।
--आईएएनएस
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