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संध्या: अभिनय और समर्पण की मिसाल एक्ट्रेस ने सीन में जान डालने के लिए की थी असली शेरों के साथ शूटिंग

संध्या: अभिनय और समर्पण की मिसाल एक्ट्रेस ने सीन में जान डालने के लिए की थी असली शेरों के साथ शूटिंग
संध्या: अभिनय और समर्पण की मिसाल एक्ट्रेस ने सीन में जान डालने के लिए की थी असली शेरों के साथ शूटिंग

मुंबई, 3 अक्टूबर (आईएएनएस)। 27 सितंबर 1938 को कोच्चि में जन्मीं विजया देशमुख (संध्या) का परिवार थिएटर की पृष्ठभूमि से ताल्लुक रखता था, जिसने उनके भीतर कला के बीज बोए। बेहतर करियर अवसरों की तलाश में वह अपनी बहन वत्सला देशमुख के साथ बंबई (अब मुंबई) आ गईं। उनका सिनेमाई सफर तब शुरू हुआ, जब उन्होंने प्रसिद्ध फिल्म निर्माता वी. शांताराम की मराठी फिल्म 'अमर भूपाली' (1951) के लिए एक समाचार पत्र के विज्ञापन का जवाब दिया।

ऑडिशन के दौरान शांताराम उनकी विशिष्ट आवाज से बेहद प्रभावित हुए, जो उनकी दूसरी पत्नी और प्रसिद्ध अभिनेत्री जयश्री से काफी मिलती-जुलती थी। इसी फिल्म के साथ विजया को उनका नया सिनेमाई नाम 'संध्या' मिला।

फिल्म में उन्होंने 'गुणवती' का किरदार निभाया और यह संगीतमय कृति इतनी कलात्मक रूप से सफल रही कि इसे 1952 के कान्स फिल्म फेस्टिवल में प्रतिष्ठित 'पाल्मे डी ओर' के लिए नामांकित किया गया।

संध्या अपने करियर की शुरुआत में कोई प्रशिक्षित शास्त्रीय नृत्यांगना नहीं थीं। इसके बावजूद 1955 की रंगीन फिल्म 'झनक झनक पायल बाजे' के लिए उन्होंने मशहूर नर्तक गोपी कृष्ण के साथ तालमेल बिठाने के लिए महीनों तक प्रशिक्षण लिया। इस फिल्म में 'नीला' के रूप में उनका शिव तांडव और भावपूर्ण प्रदर्शन उनके असाधारण परिश्रम का प्रमाण है। 1955 में हिंदी फिल्म झनक झनक पायल बाजे को राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त फिल्म 'दो आंखें बारह हाथ' (1957) में उन्होंने 'चंपा' नामक एक खिलौने बेचने वाली महिला की भूमिका निभाई। यह फिल्म इतनी प्रभावशाली थी कि इसे बर्लिन इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में सिल्वर बियर और हॉलीवुड फॉरेन प्रेस द्वारा सैमुअल गोल्डविन अवार्ड (गोल्डन ग्लोब) से सम्मानित किया गया।

इस फिल्म के गीत 'सैयां झूठों का बड़ा सरताज निकला' में सिर पर टोकरी का संतुलन, हाथ में 'रावणहत्था' वाद्ययंत्र और चलते हुए जटिल भाव-भंगिमाएं उनके मल्टीटास्किंग कौशल को दर्शाती हैं।

सिनेमा के प्रति उनका जुनून केवल नृत्य मुद्राओं तक सीमित नहीं था। 1961 में आई फिल्म 'स्त्री' में उन्होंने वास्तविक शेरों के साथ अभिनय करने के लिए शेर प्रशिक्षकों के साथ रहकर उनकी गतिविधियों को समझा और बिना किसी 'बॉडी डबल' के खतरनाक दृश्य फिल्माए।

लगभग 40 वर्ष की आयु में उन्होंने 'चंद्रकला' नामक एक तमाशा नर्तकी की चुनौतीपूर्ण और बोल्ड भूमिका निभाई, जो एक आदर्शवादी स्कूल मास्टर के पतन का कारण बनती है। इस फिल्म ने महाराष्ट्र के पारंपरिक 'लावणी' लोक नृत्य को अभूतपूर्व सम्मान और मुख्यधारा के दर्शकों तक पहुंचाया।

गीत 'मला लागली कुणाची उचकी' ने सांस्कृतिक परिदृश्य को बदल दिया और इस प्रदर्शन के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का फिल्मफेयर (मराठी) पुरस्कार मिला। 1975 में 'चंदनाची चोली अंग अंग जाली' के लिए उन्हें पुनः यह पुरस्कार मिला। संध्या और वी. शांताराम का विवाह 22 दिसंबर 1956 को हुआ था। उन्होंने महबूब खान जैसे बड़े और प्रतिष्ठित निर्देशकों के आकर्षक प्रस्ताव भी ठुकरा दिए और अपना संपूर्ण करियर केवल शांताराम के विजन को समर्पित किया।

1970 के दशक के अंत में अभिनय से संन्यास लेने के बाद उन्होंने सार्वजनिक जीवन से लगभग पूरी तरह दूरी बना ली। 2009 में 'नवरंग' की 50वीं वर्षगांठ के अवसर पर वी. शांताराम पुरस्कार समारोह में उनकी उपस्थिति एक अत्यंत दुर्लभ घटना थी। जीवन के अंतिम वर्षों में उन्होंने राजकमल स्टूडियो परिसर में ही एक बेहद एकांत और शांत जीवन व्यतीत किया। 4 अक्टूबर 2025 को उम्र संबंधी बीमारियों के कारण मुंबई में उनका निधन हो गया और दादर के शिवाजी पार्क श्मशान घाट में उन्हें अंतिम विदाई दी गई।

--आईएएनएस

वीकेयू/वीसी

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