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सख्त खाल और धीमी गति से चलने वाला कछूआ, इकोसिस्टम का खास दोस्त

नई दिल्ली, 23 मई (आईएएनएस)। प्रकृति में संतुलन बनाए रखने में कई जीव-जंतुओं का अहम योगदान होता है। यदि ये न हों तो पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बिगड़ सकता है। ऐसा ही इकोसिस्टम का एक खास साथी है सख्त खोल और धीमी गति से चलने वाला कछुआ यानी टर्टल, जो पानी और जमीन दोनों जगह पाए जाने वाला शांत स्वभाव का जीव है।
सख्त खाल और धीमी गति से चलने वाला कछूआ, इकोसिस्टम का खास दोस्त

नई दिल्ली, 23 मई (आईएएनएस)। प्रकृति में संतुलन बनाए रखने में कई जीव-जंतुओं का अहम योगदान होता है। यदि ये न हों तो पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बिगड़ सकता है। ऐसा ही इकोसिस्टम का एक खास साथी है सख्त खोल और धीमी गति से चलने वाला कछुआ यानी टर्टल, जो पानी और जमीन दोनों जगह पाए जाने वाला शांत स्वभाव का जीव है।

वास्तव में कछुए पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनके संरक्षण से नदी और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र स्वस्थ रहता है।

हर साल 23 मई को विश्व कछुआ दिवस मनाया जाता है। इस दिन का उद्देश्य कछुओं के संरक्षण के प्रति लोगों में जागरूकता फैलाना है। साल 2000 में अमेरिकन टॉरटॉइस रेस्क्यू द्वारा शुरू किए गए इस दिवस के माध्यम से कछुओं के लुप्त होते आवासों की रक्षा और उनके संरक्षण के लिए वैश्विक प्रयासों को बढ़ावा दिया जाता है।

भारत में कछुओं की सुरक्षा को लेकर सरकार काफी गंभीर है। इंडियन टेंट टर्टल को वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची-I में शामिल किया गया है। इसे उच्चतम स्तर का संरक्षण प्राप्त है। नदियों में अवैध खनन के कारण इस प्रजाति के अस्तित्व पर खतरा बना रहता है। वहीं, अवैध व्यापार और पर्यावास का क्षरण भी इन प्रजातियों के लिए प्रमुख खतरे हैं।

भारत में कछुओं की स्थिति देखें तो देश में मीठे पानी के कछुओं की लगभग 30 प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमें से 26 प्रजातियों को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की अनुसूची-I में संरक्षित किया गया है। असम, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में कछुओं की विविधता सबसे अधिक है। जानकारी के अनुसार, भारत में समुद्री कछुओं की पांच प्रमुख प्रजातियां पाई जाती हैं। इनमें ऑलिव रिडले, ग्रीन टर्टल, लॉगरहेड, हॉक्सबिल और लेदरबैक शामिल हैं। इन सभी को भी अनुसूची-I के तहत सुरक्षा प्राप्त है।

इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (आईयूसीएन) की रेड लिस्ट के अनुसार कई प्रजातियां संकटग्रस्त हैं। हॉक्सबिल टर्टल को घोर संकटग्रस्त श्रेणी में रखा गया है। कछुओं के सामने मुख्य चुनौतियों में आवास का नष्ट होना, जलवायु परिवर्तन, प्लास्टिक प्रदूषण और अवैध व्यापार शामिल हैं।

सरकार ने इनके संरक्षण और उनके आवासों की सुरक्षा के लिए कई ठोस कदम उठाए हैं। देशभर में राष्ट्रीय उद्यान, वन्यजीव अभयारण्य और संरक्षण क्षेत्र बनाए गए हैं। ‘वन्यजीव आवासों का एकीकृत विकास’ योजना के तहत राज्यों को वित्तीय सहायता दी जाती है। वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत अपराधों पर कठोर सजा और जुर्माने का प्रावधान है। वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो अवैध शिकार और व्यापार पर नजर रखता है। उत्तर प्रदेश में कुकरैल (लखनऊ), सारनाथ (वाराणसी) और चंबल (इटावा) में कछुआ संरक्षण केंद्र स्थापित किए गए हैं। प्रयागराज में 30 किलोमीटर लंबा कछुआ अभयारण्य भी बनाया गया है।

कछुओं के बारे में कई रोचक तथ्य हैं। कछुए सरीसृप वर्ग के जीव हैं। उनकी पहचान उनके कठोर खोल से होती है, जो उनके कंकाल का हिस्सा होता है। वे अपना खोल नहीं उतार सकते। कछुए ठंडे खून वाले जीव हैं और लंबे समय तक बिना भोजन के रह सकते हैं। कुछ कछुए स्थलीय होते हैं, जबकि कई प्रजातियां मीठे पानी और समुद्र में पाई जाती हैं।

--आईएएनएस

एमटी/एएस

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